Saturday, May 26, 2012

मैं कृष्ण कहां से लाऊं?




मेरे प्रिय

मुङो थोड़ा सुकून है कि आज का दिन तुमने मुङो समíपत किया है. तुम मेरी बातें करोगे, चिंता की बड़ी लकीरें खींचोगे, गोष्ठियां करोगे. तुम मे से बहुत से लोग मुङो बचाने की पहल का दस्तावेज तैयार करेंगे ताकि पर्यावरण की चिंता का कोई बड़ा पुरस्कार उन्हें मिल जाए!

कितना अजीब है ना यह सब?

मैं इसे अजीब इसलिए कह रही हूं क्योंकि मैं तो कभी मनुष्य दिवस नहीं मनाती? मेरा तो हर दिन तुम्हारे लिए है, हर रात तुम्हारे लिए है. मैं सूरज की तपन में तपती ही इसलिए हूं कि मेरी कोख में जीवन सदा सुरक्षित रहे. लेकिन ऐसा क्यों है कि तुम केवल एक दिन मेरे बारे में सोचते हो?

माना कि तुम मेरी गोद में पलने वाली प्रजातियों में सबसे श्रेष्ठ हो, बुद्धिमान हो, विजेता हो लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि तुम अपनी मां से भी बड़े हो गए? मां के बगैर क्या तुम जीवन की कल्पना कर सकते हो? कभी फुर्सत में सोचना मेरे इस सवाल पर! मैं जानती हूं कि तुम बहुत व्यस्त हो, तुम्हारी रफ्तार बहुत तेज है. लेकिन एक सच्चई से तुम्हे अवगत करा रही हूं कि रफ्तार जब हद से ज्यादा हो जाए तो दुर्घटना भी घटती है..बहुत बुरी और भीषण दुर्घटना होती है. तुम्हारी रफ्तार तुम्हे मुबारक लेकिन अपना खयाल जरूर रखना. मां हूं, सचेत कर रही हूं. ध्यान रखना मां की स्वस्थ मिट्टी ही तुम्हारा वजूद है.

मेरे प्रिय, अपने हृदय पर हाथ रख कर कहो, क्या कभी तुम्हे मेरे स्वास्थ्य का खयाल आता है? क्या कभी मेरी गोद में पल रही जिंदगी के बारे में सोचते हो तुम? कभी सोचा कि तुमने कि तुम्हे जन्म देने वाली तुम्हारी धरती मां का जन्म कैसे हुआ? चूंकि तुमने आज का दिन मेरे नाम मुकर्रर किया है इसलिए यह सब बातें तुमसे कर रही हूं अन्यथा तुम्हे मेरे बारे में सोचने की फुर्सत कहां है? बस रौंद रहे हो मुङो. खैर, मैं तुम्हे अपने जन्म की कहानी बताती हूं. तुम तो नौ महीने में जन्म ले लेते हो, लेकिन मुङो जन्म लेने में कई अरब साल लगे. बहुत पुराना किस्सा है. शायद कोई साढ़े चार अरब साल से भी पहले की बात है. तुम्हारी यह धरती मां अपने पिता ऊर्जा पूंज सूरज से अलग हो गई थी. कई अरब साल तक धधकती रही, बिल्कुल अपने पिता की तरह! लेकिन वक्त बहुत बलवान होता है. वक्त के साथ भीतर की ज्वाला कुछ ठंडी पड़ी तो उपर पपड़ी जमने लगी. भीतर से निकल रही गैसों ने मेरे चारों ओर इतना घना कोहरा पैदा कर दिया कि पिता की किरणों मुझ तक पहुंचनी बंद हो गईं. मेरा भीतरी हिस्सा और ठंडा हुआ तो सिकुड़न पैदा हुई और इन पहाड़ों का जन्म हुआ जो कहीं तुम्हारी सरहद का काम करती हैं तो कहीं तुम्हारे लिए हिल स्टेशन के रूप में तब्दील हो जाती हैं. वैसे तुम्हे बता दूं कि जब जब इन पहाड़ों का जन्म हुआ था तब मैं इस हालत में ही नहीं थी कि अपनी कोख में जीवन के बारे में सोच पाती.

गैसों के कोहरे में लिपटकर घटाटोप अंधेरे में डूबी थी मैं! कई करोड़ साल तक बस ऐसे ही अंधकार में पड़ी रही. बस ठंडी होती जा रही थी! फिर इतनी ठंडी हो गई और मेरे ऊपर आकाश में न जाने क्या हलचल हुई कि बारिश बन कर पानी का सैलाब टूट पड़ा. हजारों, लाखों सालों तक बारिश होती ही रही. ये तुम जो समुद्र देख रहे हो ना, उसी बारिश की देन है. बारिश में गैसों का बादल बह गया और करोड़ों साल बाद मैंने अपने पिता सूरज के दर्शन किए. तब ये ओजोन नाम की परत नहीं थी इसलिए पिता की तप्त किरणों(तुम्हारी भाषा में अल्ट्रा वायलेट रे) सीधी मुझ तक पहुंची. इन तप्त किरणों की मौजूदगी में जीवन की कहीं कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही थी. मैं सोच भी नहीं रही थी लेकिन तभी मेरी गोद में फैले समुद्र की अतल गहराहियों में कुछ हुआ और एक कोशिका के रूप में जीवन वजूद में आ गया. मैं हैरान थी. खुशियों से फूले नहीं समा रही थी, ठीक उसी तरह जैसे कोई मां गर्भधारण के बाद की स्थिति में होती है. वक्त के लंबे अंतराल में जीवन एक कोशिय से बहुकोशिए होता चला गया.

इधर समुद्र के भीतर जीवन नए-नए आकारों और स्वरूपों में साकार हो रहा था और उधर मेरे वायुमंडल के ऊपर कुछ ऐसा घट रहा था जो जिंदगी की नई तस्वीर पेश करने वाला था. आकाश में ओजोन की चादर बिछ रही थी. इस चादर के साथ ही अल्ट्रावायलेट किरणों का मेरे पास आना रुक गया. जीवन ने समुद्र के भीतर से छलांग लगाई और मिट्टी की सौंधी खुशबू में घुलमिल गया. मैं इस जीवन को करोड़ों वर्षो तक पालती रही, विकसित करती रही और तब जाकर तुम्हे यानि मनुष्य को पा सकी. मेरी गोद खिल उठी. सप्तरंगी हो गई मैं. मेरी गोद में जीवन की लाखों लाख प्रजातियां मौजूद हैं लेकिन तुम जैसा कोई नहीं! तुमने जब चांद पर छलांग लगाई तो मैं फूली नहीं समाई!

लेकिन अब बार-बार मुङो एक सपना आता है. बहुत खौफनाक सपना! तुम मुङो भस्मासुर के रूप में दिखाई देते हो. श्रेष्ठता की जंग में तुमने मेरी प्रकृति को चुनौती दे दी है. न केवल चुनौती दी है, तबाह कर रहे हो उसे. तुम क्लोरो-फ्लोरो कार्बन का इतना उत्सर्जन कर रहे हो कि मेरी कोख में जीवन को बचाए रखने वाली ओजोन की चादर झीनी हो रही है. डर है मुङो, तुम उसे किसी दिन क्षत-विक्षत कर दोगे. मेरे वायुमंडल को तुम्हारे वाहनों ने दूषित कर दिया है.

बुरा मत मानना, लेकिन सच कह रही हूं कि तुमने अपनी संख्या इतनी बढ़ा ली है कि तुम्हारे भार से दम घुटने लगा है मेरा.

अभी भी रुके कहां हो तुम? आबादी बढ़ाने में ही तो लगे हो!

तुमने मेरे सीने में इतना नाइट्रोजन भर दिया है कि मेरी उर्वरा प्रभावित हो रही है. यूरिया, फास्फेट और पता नहीं क्या-क्या भरते रहते हो मेरे सीने में और चीर कर निकाल लेना चाहते हो अपनी भूख मिटाने का अनाज! कब तक निकालोगे? किसी दिन सीना सूख गया तो? इस सीने को सुखा डालने का सारा प्रपंच तुमने ही तो रचा है. नदी-दालों के मेरे प्राकृतिक प्रवाह पर तुमने अपनी अट्टालिकाएं खड़ी कर लीं. बारिश को लुभाने वाले जंगलों को काट डाला. जीवन की कई प्रजातियों को निगल गए तुम. प्रकृति चक्र को तोड़ फोड़ दिया तुमने. तुम तो नष्ट होने पर उतारू हो ही, अपनी मां को भी तहस-नहस कर रहे हो.

मां कभी झूठ नहीं बोलती इसलिए बहुत कड़वी बात कह रही हूं-

तुम आर्थिक और भौतिक रूप से भले ही समृद्ध हो गए हो लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से कंगाली की ओर बड़ी तीव्र गति से बढ़ रहे हो.

धरती पर तुमने ऐसे हल्ला बोला है जैसे दु:शासन चीर हरण करने निकला हो! सभासद् मौन हैं!

मेरी चिंता है कि मैं कृष्ण कहां से लाऊं?

मेरे प्रिय, तुम्हारा भला चाहती हूं इसलिए भावावेश में बहुत कुछ कह गई. कोई मां अपने बच्चों को खुदकुशी करते कैसे देख सकती है?

तुम्हारी ¨ंजदगी खुशहाल हो, यही कामना है!

तुम्हारी

धरती मां

(शब्दांकन : विकास मिश्र)

Friday, May 25, 2012

मंदिर से ज्यादा जरूरी है स्कूल


इस देश में संत और कथावाचक बहुत से हैं लेकिन मोरारी बापू एक अलग शख्य्सियत है. उनसे बातचीत करना सत्य से साक्षात्कार करने जैसा है. उनकी मंद मधुर आवाज गहरे दिल तक पैठ बनाती है तो नजरों का तेज भीतर तक पड़ताल करती है. शिक्षा और विद्या के अंतर को परिभाषित करते हुए जब वे बताते हैं कि मैट्रिक में तीन बार फेल हो गए तो सहसा विश्वास करना कठिन हो जाता है. मोरारी बापू की यही खासियत है, नागपुर प्रवास के दौरान उनसे ढ़ेर सारे मुद्दों पर बातचीत हुई. बातचीत में लोकमत मीडिया लिमिटेड के चेयरमैन और सांसद विजय दर्डा ने भी शिरकत की. मोरारी बापू बिना किसी लाग लपेट के बोलते हैं. वे कहते हैं कि मंदिर बनाने से ज्यादा जरूरी है स्कूल बनाना क्योंकि विद्यावान व्यक्ति ही मंदिर के रहस्य को बेहतर तरीके से समझ पाएगा. वे केवल कथा वाचक नहीं हैं, यथार्थ को समझने और जीने वाले व्यक्ति हैं. उन्होंने शौचालयों के लिए रामकथा की है. रामकता से पांच करोड़ रुपए एकत्रित किए और इन्हीं पैसों से बने उनके गांव तालगजरदा और आसपास के गावों के घर-घर में अनगिनत शौचालय. पढ़िए बापू से लंबी बातचीत के कुछ परमुख अंश..





प्रश्न : भारत में धर्म, आध्यात्म और संतों की लंबी परंपरा रही है. सामाजिक सुधार की बातें लगातार होती रही हैं. इसके बावजूद अत्याचार, अनाचार, दुराचार लगातार बढ़ता गया है. क्या आपको लगता है कि संत शिक्षा परिणामदायक नहीं रही.

बापू : मेरी दृष्टि में अत्याचार और अनाचार बढ़ रहा है लेकिन मैं स्वामी विवेकानंद के एक कथन की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा. वे कहते थे कि इतने अस्पताल हैं, फिर भी बीमारी है. यदि अस्पताल नहीं होते तो क्या होता? मुद्दे की बात यह है कि घास के ढ़ेर में आग लगी हुई है तो बेहतर यह है कि जितनी घास की पुलिया (बंधा हुआ टुकड़ा) बचा सकें, बचा ली जाए. संतोष की बात यह है कि धर्म, आध्यात्म और संस्कारों के प्रति युवा पीढ़ी जागृत हो रही है.

प्रश्न : संस्कारों के संरक्षण और संवर्धन में संत परंपरा की भूमिका को आप कितना सफल मानते हैं.

बापू : मैं 100 में से 35 नंबर देना चाहूंगा. इसे पासिंग मार्क्‍स कहते हैं. जरूरत इससे ज्यादा की है. हर दिन कोशिश का है.

प्रश्न : आप लंबे अरसे तक शिक्षक रहे हैं और आज भी संस्कारों शिक्षण में लगे हैं. क्या शिक्षा की मौजूदा प्रणाली से आप संतुष्ट हैं?

बापू : शिक्षा में व्यापक बदलाव की जरूरत है. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो दीक्षा भी दे और परस्पर प्रेम की भीक्षा भी दे. विज्ञान और तकनीक का उपयोग करते हुए शिक्षा प्रणाली में संशोधन की जरूरत है. बल्कि मैं तो शिक्षा के बदले विद्या शब्द का इस्तेमाल करना चाहूंगा क्योंकि शिक्षा भयभीत करती है. मौजूदा शिक्षा स्पर्धा पैदा करती है. बेवजह स्पर्धा ठीक नहीं है. स्पर्धा एवरेस्ट तक ले जा सकती है लेकिन कैलाश (पर्वत) पाने के लिए तो श्रद्धा चाहिए!

प्रश्न : आपके कंधे पर हमेशा काला चादर रहता है, आप काला टीका लगाते हैं. लोग कहते हैं कि आपकी जन्म कुंडली में कालसर्प योग है इसलिए आप काले रंग का उपयोग करते हैं.

बापू : ये कालसर्प योग्य जैसी किसी चीज को मैं बिल्कुल नहीं मानता. पता नहीं इस तरह की बातें कहां से उठती हैं. दरअसल धर्म वह है ही नहीं जो किसी को डराए. धर्म का काम तो लोगों को अभय करना है. भय और प्रलोभन के कारण यह शुभ अशुभ का सवाल जीवन में आ गया है. यह ठीक नहीं है. मेरे काले कपड़ों या काले टीके का राज यह है कि मैं दादी की गोद में पला बढ़ा और वो काले रंग को बहुत पसंद करती थीं. बस काले रंग से प्रेम हो गया. काला रंग वैसे भी गहनता का प्रतीक है.

चुनरी ओढ़ी रंग चुए

रंग बिरंगी होए!!

मैं तो ओढ़ूं कारी कांवरी

जिसमें दूजो रंग न लाए कोय!!

प्रश्न : आपकी कथा में शायरी भी है, गजल भी है. फिल्मी गीतों की पैरोडी भी है और मटके की मीठी टन-टन भी? क्या यह सब कथा को रोचक बनाने के लिए? या कोई और कारण?

बापू : रामकथा तो वास्तव में गायन ग्रंथ ही है! श्रद्धा के लिए गीत-संगीत तो जरूरी है. गजल और भजन में कोई अंतर नहीं है. साहित्य के प्रति मेरी अभिरुचि रही है. मेरे गांव में साहित्यक सम्मेलन होते रहे हैं. जहां तक मटका बजाने का सवाल है तो यह मेरे गांव की परंपरा का वाद्य यंत्र है.

प्रश्न : एक बहुत पुराना सवाल आपके सामने भी दोहराना चाहूंगा कि धर्म और राजनीति का घालमेल कितना खतरनाक लगता है आपको?

बापू : धर्म को सामाजिक रूप से देखने की जरूरत है. सत्य, प्रेम और करुणा वाला धर्म राजनीति में होना चाहिए. गांधीजी में यह था. दरअसल धर्म में भी संशोधन की जरूरत है. वास्तविक धर्म वही है जो जीवन को संस्कारित करे. धर्म को भय के सहारे की जरूरत नहीं होनी चाहिए. मनुष्य को आज भय डस रहा है.

प्रश्न : गंगा को बचाने के लिए सार्थक पहल कहीं नजर आती है आपको?

बापू : प्रयास तो हो रहे हैं, योजनाएं बन रही हैं, क्रियान्वित हो रही हैं लेकिन सफलता के लिए यह जरूरी है कि सब लोग मिलजुल कर प्रयास करें. सामाज, सरकार और संस्कार की त्रिवेणी ही गंगा को बचा सकती है. गंगा को केवल धर्म के नजरिए से नहीं बल्कि सामाजिक नजरिए से देखिए. गंगा लाखों लोगों के लिए जीवन का आधार हैं. नासमझी ने गंगा मैली कर दी!

प्रश्न : मोह और माया से क्या व्यक्ति कभी दूर हो सकता है?

बापू : मोह, माया, काम-क्रोध, लोभ का जीवन में संतुलन होना चाहिए





ऐसे जुड़ा बापू शब्द

गुजरात के भावनगर जिले में महुआ के पास एक छोटे से गांव तालगजरदा में महाशिवरात्रि के दिन मोरारी बापू का जन्म हुआ. पिता का नाम प्रभुदास बापू और माता का नाम हरियानी. यह परिवार बाबा साधु निम्बारिका परंपरा वाला परिवार है जहां हर पुरुष को बापू कहा जाता है. इस तरह उनके नाम के आगे भी बापू शब्द जुड़ गया.

परिवार और बचपन

मोरारी बापू के पांच भाई और तीन बहनें हैं. एक बेटे और तीन बेटियों की शादी हो चुकी है. नाती पातों से भरा पुरा परिवार है. बापू का बचपन अपनी दादी अमृत मां के सानिध्य में गुजरा. दादी उन्हें लोककथाएं सुनाया करती थीं. केवल पांच वर्ष की उम्र में दादा जी त्रिभुवनदास बापू ने उन्हें रामचरित मानस की शिक्षा देनी शुरु की. वही मुरारी बापू के एकमात्र गुरु हैं. वे रामचरित मानस के ज्ञाता माने जाते थे. प्रति दिन वे बापू को पांच चौपाईयां याद करवाते और उनके गहन गूढ़ अर्थ समझाते. बापू का स्कूल घर से करीब 7 किलो मीटर दूर था और स्कूल जाने तथा लौटने के दौरान रास्ते के समय का उपयोग बापू उन चौपाईयों को याद करने और उनके अर्थ समझने में करते थे. घर लौटकर दादाजी के पास पहुंच जाते और उन्हें सुनाते. बापू की योग्यता को संवारने में उनके चचेरे दादाजी महामंडलेश्वर विष्णुदेवानंद गिरी जी महाराज का भी काफी योगदान रहा. वे कैलाश आश्रम ऋषिकेष में रहते थे. भगवत गीता और वेद के ज्ञाता विष्णुदेवानंदजी बापू को निरंतर पत्र लिखा करते थे.

शिक्षक थे बापू

बारह वर्ष की उम्र तक बापू को रामचरितमानस पूरी तरह कंठस्थ हो गया था और रामचरित मानस के संदर्भ में उनके ज्ञान को देखकर गांव के बुजूर्ग अचंभित हो रहे थे. स्नातक तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद बापू ने जूनागढ से शिक्षक होने का प्रशिक्षण लिया. करीब दस सालों तक उन्होंने शिक्षक की भूमिका निभाई. इस दौरान वे आध्यात्मिक और साहित्यिक आयोजनों में श्रोता की भूमिका में शिरकत करते रहे. 1960 में तालगजरदा में पहलीबार उन्होंने रामकथा कही. तब से जो शुरुआत हुई तो बापू को सुनने वालों की भीड़ बढ़ती चली गई. वे रामकथा को प्रेम यज्ञ कहते हैं. वे प्रवाही प्ररंपरा के व्यक्ति हैं.



कोटेशन

-आदमी का भीतरी खालीपन केवल दो चीजो से भरा जा सकता है, प्रेम से और त्याग से.

-संघर्ष में कोई निर्णय ना लें, क्योंकी संघर्ष में हमारे चित की दशा ठीक नहीं होती.

-जब निकट के लोग निंदा करने लगे तो समझना सत्य परम निकट है.

-भरोसा ही भजन है.

-आदमी को तीन काम करना चाहिये: देह सेवा, देव सेवा और देश सेवा

- अगर कोई पूछे, सत्य की व्याख्या करो, तो शांत रहो. यह है सत्य की व्याख्या.

अगर कोई पूछे, प्रेम की व्याख्या करो, तो थोडा मुस्करा दो. यह है प्रेम की व्याख्या.

अगर कोई कहे, करुना की व्याख्या करो, आंख मे थोड़ी सी नमी भर लो. यह है करुना की व्याख्या.





सबको शिक्षा, अन्न औार आदर मिलनी चाहिये.

बड़े मुर्खो के छोटे सपने!




सपने देखने के लिए मुङो कभी किसी नसीहत की जरूरत नहीं पड़ी. मैं सपने तब से देखता हूं जब अब्दुल कलाम साहब ने यह नेक नसीहत देश को नहीं बांटी थी. मैं सपने खूब देखता हूं लेकिन नींद में. मैं इस बात से कतई सहमत नहीं हूं कि जागते हुए देखे गए सपनों को पूरा करने की प्रेरणा भीतर से मिलती है. मैं पूरी तरह विज्ञान पर भरोसा करता हूं और अभी तक विज्ञान ने भीतर कोई ऐसा अंग नहीं ढूंढ़ा है जो प्रेरणा देता हो. बहरहाल रात ढ़ले जब भी मैं कोई सपना देखता हूं तो फौरन रवींद्र नाथ बहोरे की किताब खोल लेता हूं. इस किताब का नाम है ‘सपने बोलते हैं’ मैं यह जानने की कोशिश करता हूं कि मेरे सपने क्या बोल रहे हैं. खैर अभी तक पता नहीं चला कि सपनों ने कब क्या कहा? वैसे पता चल भी जाता तो अपन क्या कर लेते?

अचानक एक दिन खयाल आया कि मुर्खो के बारे में बहोरे जी की राय क्या है? पन्ने पलटे और पढ़कर दिल बाग-बाग हो गया! लिखा है- ‘अगर आप स्वप्न में किसी मूढ़ या मुर्ख को देखते हैं तो यह शुभ है. आप अपना निजी व्यवसाय आरंभ करेंगे. आपके मित्र सच्चे और वफादार होंगे. इन मित्रों से आपको लाभ भी होगा. यदि आप स्वप्न में अपने को जड़बुद्धि या मुर्ख व्यक्ति के रूप में देखते हैं तो निश्चय ही आपके भावी अनुबंध पूर्ण होंगे. उनमें आपको सफलता मिलेगी.’ बहोरे जी के इस ज्ञानपूर्ण विचार से मैं पूरी तरह सहमत हूं. सपनों की बात तो छोड़िए यह बात सामान्य जिंदगी में भी सोलह आने सच है. मुर्खो का दिखना या अनके साथ रहना इस मायने में बहुत ही फायदेमंद है कि उनसे ठगे जाने या छले जाने का कोई भय आपको नहीं होगा. मुर्खो के भीतर चालाकी नाम की फितरत नहीं होती है इसलिए आप उनका लाभ उठा पाएंगे. यदि आप जड़बुद्धि बन जाएं तो लोग आपके साथ निश्चय ही अनुबंध करना चाहेंगे क्योंकि उन्हें छले जाने का भय नहीं होगा. कहने का मतलब है कि धोखेबाजी का भय केवल बुद्धिमानों के साथ है. इसलिए मेरी राय यही है कि मुर्खो को दोस्त बनाइए और लाभ कमाइए. मुर्ख वफादार होते हैं, भरोसेमंद होते हैं, आपकी फितरतों के आसानी से शिकार हो जाते हैं. होशियार आदमी आपको धोखा दे सकता है, आपके साथ छलात्कार कर सकता है. मुर्ख दोस्त से ऐसे खतरे नहीं होते हैं. लाभ कमाने का अपना सपना आप मुर्खो के साथ पूरा कर सकते हैं. इसलिए सपनों में लगातार मुर्खो को आमंत्रित करते रहिए और मुनाफा कमाते रहिए.

वैसे एक मुर्खतापूर्ण सवाल कई बार बहुत परेशान करता है और वो ये है कि क्या मुर्ख भी सपने देखते हैं? मैंने काफी माथापच्ची की (ऐसा मैं मानता हूं) और इस नतीजे पर पहुंचा कि मुर्खो के भी सपने होते हैं. मेरा अनुभव है कि छोटे मुर्ख बड़े सपने देखते हैं और बड़े मुर्ख छोटे सपनों में उलझ कर रह जाते हैं. मसलन कि गांव की सड़क बन जाए, स्कूल में मास्टरसाहब बच्चों को पढ़ाएं, प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर खूबसूरत नर्स हो तो डाक्टर साहब भी थोड़ा समय वहां दें, गली में नाली का पानी न बहे, नल से चौबीस घंटे पानी आए. धनिया में घोड़े की लीद न मिली हो, बाजार में पूरी तरह शुद्ध सामग्री मिले. ट्रेन लेट न हो, सड़क पर चलते समय जान जाने की फिक्र न हो! ऐसे छोटे सपने लोग देखते रहते हैं लेकिन हमारी व्यवस्था इतनी बड़ी है और उसके पास इतने बड़े-बड़े काम है कि लोगों के छोटे सपने पूरे करने का वक्त कहां है उसके पास? व्यवस्था की व्यस्तता को समङिाए और इस तरह के छोटे सपने मत देखिए! सपने देखना है तो बड़े घोटालों के सपने देखिए. बिस्तर के गद्दे में नोट भरने के सपने देखिए.

मुर्खताएं कीजिए और खुशहाल रहिए..!

मां तुझे सलाम




मशहूर शायर मुन्नवर राना का एक शेर है..

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है.

माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है.

वाकई मां की ममता का इससे बेहतर वर्णन नहीं हो सकता है. आप लाख गलती कर लें, अपनी हरकतों से मां को ठेस पहुंचा दें लेकिन मां हमेशा ही अपने बच्चों की सलामती चाहती है. मां का प्यार वह उर्जा है जो साधारण इनसान को असंभव कार्य करने में सक्षम बनाती हैं.

मदर्स डे के मौके पर कहिए..

मां तुङो सलाम!

तेजी से चेहरे बदलती, दौड़ती और भागती दुनिया में कुछ बिल्कुल शांत, संयमित और उर्जा से परिपूर्ण नजर आता है तो वह मां का प्यार है, उसकी ममता है. पता नहीं ब्रह्मांड के कहीं सुदूर स्वर्ग नाम की कोई जगह है या नहीं, पता नहीं वहां अमृत नाम की कोई चीज है भी या नहीं. लेकिन हमारी इस दुनिया में स्वर्ग भी है और अमृत भी! मां की गोद और उसके आंचल की छांव हमारे लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं. उसका ममत्व किसी अमृत से कम नहीं! सीधे तौर पर मां ही हमारे लिए ईश्वर है क्योंकि उसी ने तो हमें जन्म दिया है. हम उसकी इबादत न करें तो किसकी करें? हमने जिस ईश्वर को कभी देखा नहीं, वह हमारी मां से ज्यादा बेहतर हो ही नहीं सकता!

एक यहूदी कहावत है कि एक मां वह भी समझ लेती है जो उसका बच्च नहीं कहता! यह नैसर्गिक सच्चई है. बचपन में जब हम कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होते तब भी मां को बहुत अच्छी तरह पता होता है कि हमें क्या चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जब हम बड़े हो जाते हैं तो यह जानने की कभी कोशिश नहीं करते कि हमारी मां क्या चाहती है? हम शायद भूल जाते हैं कि पूरी दुनिया के लिए हम केवल एक व्यक्ति हैं लेकिन अपनी मां के लिए हम पूरी दुनिया की तरह हैं. वह हमारी आंखों में अपना अक्स देखती है. हमारी खुशियों में अपना वजूद तलाशने की कोशिश करती है लेकिन हम हैं कि मां की भावनाओं के प्रति उतने सचेत नही होते जितना होना चाहिए. अपनी घर गृहस्थी क्या बसा ली, मां से ही दूर होते चले गए? वो खुशनसीब लोग हैं जिन्होंने मां की अहमीयत को खुद में समेटे रखा है और मां की गोद की खुशबू को अपनी खुशबू के रूप में तब्दील कर लिया है.

लेकिन क्या हिंदुस्तान की हर मां इतनी खुशनसीब है कि बुढ़ापे में भी उसका बच्च उससे भावनात्मक रूप से जुदा न हो? मुङो लगता है कि दिन प्रतिदिन की घटनाएं और ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या साफ-साफ कहती है कि मां के ममत्व का सिला हम नहीं दे रहे. जो मां हमें अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए अपनी जिदंगी के कई साल प्यार और मोहब्बत के साथ खर्च कर देती है, वही मां जब शारीरिक रूप से कमजोर होने लगती है और उसे हमारे सहारे की जरूरत होती है तो हम मुंह छिपाने लगते हैं. हम अपने जीवन आनंद में ज्यादा मशरूफ हो जाते हैं. लेकिन कमाल की बात यह है कि मां फिर भी ममत्व नहीं छोड़ती. पिछले दिनों मैं कुछ बेसहारा माओं का दर्द जानने एक ओल्ड एज होम गया. उनकी बातें सुनीं, उनका दर्द सुना लेकिन कोई भी मां यह बताने को तैयार नहीं थी कि उसके बेटे का नाम क्या है जिसने उसे यहां छोड़ दिया है. हर मां को केवल यह चिंता सता रही थी कि अखबार में जानकारी छपेगी तो बेटे की बदनामी होगी. जरा सोचिए कि मां कितना सोचती है. जिस बेटे-बहू ने उसे ओल्ड एज होम पहुंचा दिया, उसके नाम की भी सलामती चाहती है मां. यही तो मां की वास्तविकता है. पुत भले ही कपूत हो जाए, मां का ममत्व कभी कम नहीं होता.

ऐसी मां को हम सलाम करते हैं.

बहुत से घरों के भीतर भी मां की हालत ठीक नहीं है. हास्य-व्यंग के मशहूर कवि सुरेंद्र शर्मा बड़ी सटीक व्याख्या करते हैं. वे कहते हैं- ‘हम एक तरफ पूजा के लिए माता की चौकी सजाते हैं और दूसरी तरफ घर की मां चौकी पर बैठकर बर्तन मांजने पर मजबूर होती है.’ तेजी से भौतिकवादी होते समाज के इस बदलाव को हमें गंभीरता से लेना होगा. जो लोग मां के साथ अपनमानजनक व्यवहार करते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि उनकी औलाद भी उनके साथ इसी तरह का व्यवहार करेगी. हमारी पुरानी सामाजिक व्यवस्था में बुजुर्गो को सम्मान देने की परंपरा रही है लेकिन भागती दौड़ती दुनिया में सम्मान की यह परंपरा समाप्त होती जा रही है. हालात ठीक नहीं हैं. याद रखिए मां की उपेक्षा पूरे समाज को तबाह कर देगी.

मां से बड़े होते बच्चे

मां के लिए यह बड़ी कठिन दौर है. दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है और उसके बच्चे दुनिया की माया में इस तरह रमे जा रहे हैं कि मां स्वयं को कई बार उपेक्षित महसूस करने लगी है. बच्चों के पास अब कंप्यूटर है, इंटरनेट है..विस्तृथ दुनिया उनके लिए खुली पड़ी है. मां के बचपन में यह सब नहीं था. तकनीक की दुनिया विकसित नहीं हुई थी. शायद इसीलिए बच्चों को यह लगने लगा है कि मां मौजूदा दौर की इस दुनिया को नहीं समङोगी. हकीकत यह है कि मां के दर्द को समझने की बच्चे कोशिश नहीं कर रहे हैं.

मेरी एक परिचित महिला हैं. उनका बच्च इंजीनियरिंग कर रहा है. महिला पढ़ी लिखी हैं, प्रोफेसर रही हैं. उनके मन में सहज जिज्ञासा रहती है कि बच्च क्या पढ़ रहा है? क्या कर रहा है? वे जानना चाहती हैं लेकिन बच्चे की ओर से कई बार टका सा जवाब आ जाता है- ‘इस विषय को तुम नहीं समझ पाओगी!’ वे दंग रह जाती है. जानती हैं कि इंजीनियरिंग के विषयों को समझ पाना उनके लिए बहुत आसान नहीं होगा लेकिन वे यह भी जानती हैं कि कुछ तो समझ ही सकती हैं.

उन्हें पीड़ी इस बात की होती है कि बच्चे मां की भावना को क्यों नहीं समझते? हमारे एक और परिचित परिवार में यही कहानी है. बच्च अपने पिता को तो अपनी पढ़ाई या अपनी गतिविधियों की पूरी जानकारी देता है लेकिन मां को अत्यंत संक्षिप्त जानकारी देकर बात समाप्त कर देता है. वह कहता है कि मां को समझाने का मतलब है कि एबीसीडी से शुरु करो. इतना वक्त कहां है? इस तरह की कहानियां आपको करीब-करीब हर घर में मिल जाएंगी.

महत्वपूर्ण मसला यह है कि क्या केवल सांसारिक जानकारियों के आधार पर बच्चे अपनी मां से बड़े हो सकते हैं? हमें बच्चों को प्रारंभिक दौर से ही यह शिक्षा देनी चाहिए कि मां का स्थान किसी भी जानकारी या ज्ञान से बिल्कुल अलग है. आप दुनिया में बहुत सफल व्यक्ति हो सकते हैं, शिखर पर पहुंच सकते हैं लेकिन याद रखिए कि अपनी मां से बड़े कभी नहीं हो सकते. मां के पास थोड़ी देर बैठना और उन्हें समझाना कि आप क्या कर रहे हैं, एक सुखद अनुभव होता है. कुछ देर मां के साथ बैठिए, मां से हमेशा छोटे रहिए!

कनपटी पर बंदूक...मांग में सिंदूर

कनपटी पर बंदूक


मांग में सिंदूर



फिल्म अभिनेता आमिर खान ने बिहार के पकड़ऊआ शादी को नेशनल स्टेज पर ला दिया है. आमिर ने ऐसी शादी के शिकार जिस युवक की कहानी बताई, उसका अंत सुखद रहा लेकिन हकीकत यह है कि ऐसी शादियों के साथ एक लंबी त्रसदी जुड़ी होती है और अमूमन जिंदगी एक टीस बनकर रह जाती है. इस तरह की खौफनाक शादियां उत्तर बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के बड़े हिस्से में पिछले करीब चालीस साल से जारी हैं. कहा यह जाता है कि पकड़ऊआ शादी की असली वजह दहेज है लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है. इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी शादियों की शुरुआत दहेज की वजह से हुई थी लेकिन अब तो यह पूरी तरह दबंगता की कहानी है और इसमें भी दहेज शामिल है.

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई सामान्य व्यक्ति किसी युवक का अपहरण कर ले और अपनी बेटी या बहन की शादी उससे कर दे? दरअसल इस तरह की शादियों की शुरुआत बिहार के बेगुसराय और मोकामा इलाके में सन् 70 के दशक में भुमिहार जाति में शुरु हुई. दबंग किस्म के परिवारों ने ऐसे युवकों को निशाना बनाया जो पढ़े लिखे थे और किसी अच्छी नौकरी में चले गए थे या फिर बड़े पैसेवाले परिवारों से थे. ऐसे युवकों को बंदूक की नोक पर उठाया जाने लगा और शादियां होने लगीं. अपहरण करने वाले चूंकि दबंग लोग थे इसलिए उनके गांव के लोगों ने भी कोई विरोध नहीं किया. इस तरह यह सिलसिला चल निकला. इस मामले को दहेज से जोड़ दिया गया ताकि समाज की सहानुभूति समेटी जा सके. धीरे-धीरे यह रोग भुमिहारों के दायरे से बाहर निकलने लगा और दूसरी जातियां भी इस तरह के अपहरण और शादी में शामिल होने लगीं. अब तो करीब-करीब पूरा उत्तर बिहार और उत्तर प्रदेश का पूर्वी हिस्सा इसकी चपेट में है.

ऐसे होता है अपहरण

लड़की के परिवारवाले ऐसे किसी लड़के पर नजर रखते हैं जो अच्छे परिवार का हो, आर्थिक रूप से सक्षम हो और जिसे डराया धमकाया जा सके. इस तरह का युवक जब उनकी निगाह में आ जाता है तब वे किसी ऐसे अपराधी गुट से संपर्क साधते हैं जिसके लिए अपहरण कोई बड़ी बात नहीं होती है. गुंडों का ऐसा समूह युवक की गतिविधियों पर नजर रखता है और मौका पाते ही बंदूक की नोक पर युवक का अपहरण कर लिया जाता है. यदि युवक ने हो हल्ला मचाने की कोशिश की या मौके पर पहुंचकर शादी करने से इनकार किया तो उसकी जमकर पिटाई भी की जाती है. उसे इतने दहशत में डाल दिया जाता है कि चुपचाप शादी कर लेने के अलावा उसके पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचता है. शादी की तस्वीरें खींची जाती हैं. गवाह तैयार किए जाते हैं ताकि मामला यदि कोर्ट में जाए तो यह साबित किया जा सके कि युवक ने अपनी मर्जी से शादी की है. इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर तबके के बीच आमतौर पर पकड़ऊसा शादी नहीं होती है. ऐसी शादियों में वही लोग संलग्न होते हैं जो आर्थिक और सामाजिक तौर पर मजबूत होते हैं.

फिर होता है समझौता

शादी हो जाने के बाद युवक के परिवारवालों को सूचना दी जाती है कि शादी हो गई है, बहु की बिदाई के लिए आ जाएं. सामान्य तौर पर लड़के के परिवार वाले गुस्से में आ जाते हैं और दुल्हन की बिदाई के लिए तैयार नहीं होते हैं लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि बेटा ससुराल कैद रहता है. इधर अपराधी गुट लड़के के परिवारवालों को धमकाता है और उधर लड़की के परिवावार वाले यह प्रस्ताव रख देते हैं कि मामला ले देकर सुलझा लिया जाए. चूंकि लड़के के परिवारवालों के पास बेटे की सुरक्षा का कोई दूसरा रास्ता नहीं रहता इसलिए वे सामान्यत: समझौते के मूड में आ जाते हैं और दहेज के लेनदेन के साथ समझौता हो जाता है.

लड़की बेचारी..!

आश्चर्यजनक बात यह है कि लड़की को यह पता तक नहीं होता कि किस लड़के से उसकी शादी कराई जा रही है. उसकी तो जान सूूखी रहती है. उसे पता है कि शादी के बाद ससुराल में उसे प्रताड़ना का शिकार होना ही है. घर वाले या गुंडों की फौज हर पहर तो उसकी रक्षा में वहां तैनात नहीं रह सकती! होता भी यही है. गुंडों की धमकी के आगे झुका परिवार बहु को बिदा करा कर ले जाता है लेकिन बहु की अगवानी क्रोध की ज्वाला के बीच होती है और आप कल्पना कर सकते हैं कि ससुराल पहुंचकर लड़की की हालत क्या होती होगी. मैंने ऐसे उदाहरण भी देखे हैं कि लड़की एक बार तो ससुराल चली गई लेकिन दोबारा मायके लौटी तो फिर कभी ससुराल वालों ने झांक कर नहीं देखा. खासकर जब लड़के वाले भी दबंग होते हैं तो लड़की की जिंदगी तबाह होकर रह जाती है. उसकी जिंदगी में कसक के सिवा कुछ नहीं बचता है. वह सामाजिक प्रताड़ना की शिकार होती है.

खटास भरी जिंदगी

यदि धमकी के कारण लड़के के परिवारवालों ने लड़की को स्वीकार भी कर लिया तो क्या ऐसी शादियों में पति-पत्नी के बीच रिस्ता क्या कभी सहज हो सकता है? क्या उनके जीवन में वह माधुर्य हो सकता है जिसकी कल्पना नवदंपत्ति के बीच की जाती है? क्या लड़का कभी यह भूल सकता है कि उसे बंदूक की नोक पर उठा लिया गया था और यह लड़की उसके गले बांध दी गई . आमिर खान ने जिस व्यक्ति को सत्यमेव जयते कार्यक्रम में बुलाया था, उसके जैसे कुछ अपवाद भले ही होते होंगे लेकिन ज्यादातर के लिए तो रिस्ता खटास भरा ही होता है.



लड़के नहीं जाते गांव

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जो लड़के बिहार से बाहर पढ़ रहे हैं, शादी की उम्र के हैं या जो नौकरी कर रहे हैं, वे सामान्यतौर पर अपने गांव जाने से बचते हैं. उनके परिवार को यह भय सताता रहता है कि पता नहीं वे गांव आएंगे और पकड़ऊआ शादी हो जाएगी. मेरे एक परिचित हैं जिनका लड़का एक शिपिंग कंपनी में काम करता है. पिछले चार साल से वह अपने गांव नहीं गया है. माता-पिता से मिलने के लिए वह अपनी बहन के घर जबलपुर पहुंचता है. वहीं माता-पिता भी आ जाते हैं. कुछ दिन साथ रहते हैं और लौट जाते हैं. यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा जब तक कि युवक की शादी नहीं हो जाती.

लाचार हुआ कानून

पकड़ऊआ शादी के मामले में वास्तव में कानून पूरी तरह लाचार नजर आता है. यदि कोई व्यक्ति अपने बेटे के अपहरण की रिपोर्ट भी दर्ज करा दे तो कुछ खास असर नहीं पड़ता क्योंकि जब तक पुलिस सक्रिए होगी तब तक शादी हो चुकी होती है. शादी के समय गुदगुदी लगाकर लड़के को हंसा दिया जाता है ताकि फोटो में वह खुश नजर आए और दावा किया जा सके कि लड़के ने मर्जी से शादी की है. विवाद की स्थिति में लड़की वाले दहेज मांगने का दावा कर देते हैं. लड़की के हक में बने कानूनों का दुरुपयोग करने की पूरी आजादी लड़की वालों को होती है. इस तरह कानून पूरी तरह इस मामले में लाचार नजर आता है.