Wednesday, May 30, 2018

सफर चीन बोर्डर तक (अंतिम भाग)

सफर चीन बोर्डर तक
(अंतिम भाग)
चीनियों से बचने के लिए भागती रही 15 साल की वो लड़की
तवांग में सारी आधुनिकता आपको मिलेगी. शहर बहुत महंगा है क्योंकि यहां हर चीज करीब पौने तीन सौ किलो मीटर दूर तेजपुर से आता है. आने-जाने का साधन महंगा है तो स्वाभाविक तौर पर शहर में महंगाई होगी ही! शाम को यूं ही टहलते हुए हम एक रेस्टोरेंट के पास से गुजर रहे थे. रेस्टोरेंट के बाहर एक सज्जन बैठे थे. बहुत बुजुर्ग नजर आ रहे थे और मुङो लगा कि 1962 की लड़ाई के बारे में शायद कुछ जानकारी दे पाएं. हमने बातचीत शुरु की. उनका नाम था ताशी! वे बिल्कुल स्थानीय भाषा बोल रहे थे जो थोड़ा-थोड़ा ही समझ में आ रहा था. बस इतना समझ में आया कि उन्होंने 20 साल फौज के साथ काम किया था लेकिन पेंशन नहीं मिल रहा है. रेस्टोरेंट के बाहर बोर्ड पर लिखा था-ड्रेगन रेस्टोरेंट! आमतौर पर हम ड्रेगन का संबोधन चीन के लिए करते हैं इसलिए जिज्ञासावश उस रेस्टोरेंट में चला गया. रेस्टोरेंट करीब-करीब खाली था. खाने के लिए हमने ‘मोमो’ ऑर्डर किया और रेस्टोरेंट के युवा मालिक से गुफ्तगू करने लगे. उसने दुकान का नाम ड्रेगन रखा था लेकिन था वह चीन का भयंकर विरोधी. कहने लगा कि तिब्बत तो क्या चीन को लोग ही चीन से खुश नहीं है. वह धोखेबाज है. वास्तव में तवांग में हर कोई चीन को धोखेबाज मानता है. हर कोई यही कहते मिला कि चीन ने तिब्बत को धोखे से हड़प लिया. तवांग का भाग्य अच्छा है कि वह भारत का हिस्सा बना.
यदि चीन फिर आ जाए तो? इस सवाल पर हर कोई यही कहता है कि हमारी फौज इतनी ताकतवर है कि 1962 की तरह तवांग पर चीन कब्जा नहीं कर सकता है.
हम किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो 1962 की लड़ाई का चश्मदीद हो. अंतत: पहाड़ के उतार पर हम एक ऐसी महिला से जा ही मिले. उनका नाम है वांगमू. ऐसी हिंदी बोल लेती हैं कि आप समझ जाएं. उम्र यही कोई 70 साल है. चीनी हमले के वक्त वे केवल 15 साल की थीं. उन्हीं के शब्दों में सुनिए उस वक्त की कहानी-‘हमारे चाचा तोका भारतीय सेना की मदद के लिए बोर्डर पर गए थे. एक दिन वे दौड़ते हुए और पूरे परिवार से कहा कि भागो. मैं तो छोटी थी, केवल इतना ही समझ पाई कि चीन की सेना हमें मारने आ रही है. घर का सामान लेकर तो भाग नहीं सकते थे, इसलिए जो कुछ भी कंधे पर लाद सकते थे, वह लेकर भागे. हम भागते रहे, सड़क तो कहीं थी नहीं, कभी नदी के किनारे तो कभी पहाड़ों को पार करते हुए हम जांग पहुंचे. कहने में आसान लगता है लेकिन जांग की दूरी यहां से करीब 40 किलो मीटर है. हम किसी तरह वहां पहुंचे. वहां से सेना हमें बोमडीला ले गई. एक दिन वहां रखने के बाद हमें फुटलिंग ले जाया गया. खाना पीना भारत सरकार की तरफ से मिल रहा था. वहां से सेना हमें आसाम के रीलिफ कैंप मासामारी ले गई. बाद में गुवाहाटी ले गए ट्रेन से. एक स्कूल में रखा. विवेकानंद वाले स्वामी जी आए थे मदद देने. वहां से मिर्जाबागी ले गए और पंद्रह दिन रखा. फिर ट्रेन से कहीं ले गए. उसके बाद पता चला कि चीन ने तवांग खाली कर दिया है तब हम तवांग लौटे. ज्यादातर यात्र पैदल ही पूरी की. रास्ते में हमने अपने सैनिकों की लाशें दिखीं. बहुत से सैनिक मरे थे. सेला के पास एक जगह हमने देखा कि फौजियों की जो लाशें थीं, उन्हें कुत्ताें ने खा लिया था. हमने बड़ा विभत्स दृष्य देखा. मोनकी नाम की जगह में बहुत से सैनिकों का क्रियाकर्म किया था. दिरांग से तवांग के बीच में है यह स्थान. परिवार में मां थी जो दिरांग तक पहुंची लेकिन तवांग नहीं पहुंच पाईं. यहां आए तो घर लुटा हुआ था. घर नहीं तोड़ा था लेकिन जो सामान घर में था वह ले गए. खेती नष्ट हो गई थी. बोमडीला में जब थे तब फायरिंग की आवाज सुनाई देती थी. दार्जिलिंग का एक अफसर था जॉन उसे गोली मार दी गई थी. बहुत से लोग जो भाग कर बोमडीला गए वे वहीं बस गए. खासकर बौद्ध भिक्षु वापस नहीं आए. हम लोग वापस आ गए. गनीमत थी कि यहां खाने के लिए सरकार की तरफ से सामान हवाई जहाज से गिराया जा रहा था. हायर सेकेंडरी स्कूल के पास राशन गिराया जाता था. राशन के बड़े बड़े बक्से गिराए जा रहे थे. उसमें भी दबकर कई लोग मरे. राशन के बक्से गिराने वाले नए फौजी थे जिन्हें इस इलाके की जानकारी नहीं थी.’
वांगमू से मिलने के बाद हम ऐसे ही कुछ और लोगों की तलाश में तवांग मोनेस्ट्री जा पहुंचे. बड़ा ही खूबसूरत स्थान है यह. मोनेस्ट्री के संग्राहालय में एक बौद्ध भिक्षुक ने हमारा स्वागत किया. हमने उनसे तत्काल पूछ लिया कि क्या 1962 के युद्ध की कुछ यादें हैं उनके पास? उन्होंने अपना नाम कोंबू बताया और गहने लगे-‘हम लोगों को बताया गया कि चीन ने हमला किया है. भाग जाओ. हम भाग गए. हम पहाड़ पार कर रोंगचा चले गए. चीन की सैनिकों को हमने नहीं देखा. हम तीन महीने बाहर रहे. दो तीन भिक्षुक यहां रुक गए थे. वो लोग अब नहीं रहे. उन लोगों ने बताया कि चीन ने लोकल लोगों को कुछ नहीं किया. केवल दो लोगों को मारा जो फौजी को राशन देने गया था. केवल भारतीय सैनिकों को मारा. बोमडीला के पीछे चकोला तक कब्जा किया. जब बोमडीला में गोली चलने लगी तो हम वहां से भी भाग गए. मैं भाग कर रोंगटा चला गया. फिर रूपा के पास रहा. जब चीन के सैनिक लौट गए तब हम तवांग वापस आए.’ मोनेस्ट्री के पास बने एक घर में मुङो एक अत्यंत बुजूर्ग सज्जन मिले. उम्र होगी कोई 86 के पार लेकिन वे अब बोलने की स्थिति में नहीं हैं. वे बोल बाते तो शायद कुछ और कहानी मिलती!
परमवीर की प्रतीमा के पास चार मटकों में रखी है शहीदों के खून से सनी मिट्टी
एक पूरी दोपहर और शाम हमने तवांग के वार मेमोरियल में गुजारी. ये मेमोरियल उन 2420 सैनिकों की याद में बना है जो इस इलाके में शहीद हुए. यहां परमवीर चक्र से नवाजे गए सुबेदार जोगिंदरसिंह की प्रतीमा बनी हुई है. वे तवांग के पास तोंगपेंग ला पर तैनात थे. बुमला पास की ओर से जब चीनियों ने पहला हमला किया तो जोगिंदर सिंह के कई साथी सैनिक शहीद हो गए लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और चीनियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. कुछ ही देर में चीनियों ने फिर हमला किया. इस बार हमला ज्यादा खतरनाक था. जोगिंदरसिंह के आधे से ज्यादा साथी सैनिक शहीद हो गए. खुद जोगिंदरसिंह भी बुरी तरह घायल हो गए थे लेकिन उन्होंने हाईकमान के आदेश के बावजूद पीछे हटने से इनकार कर दिया. चीनियों ने इसी बीच तीसरा हमला किया. घायल होते हुए भी जो¨गंदरसिंह ने अपनी मशीन गन से 52 चीनियों को मार गिराया. जब गोलियां समाप्त हो गईं तो जोगिंदरसिंह और उनके बचे हुए साथी अपने बंकरों से निकल आए और बंदूक पर लगे बैनट से बहुत से चीनियों को मौत के घाट उतार दिया. घायल अवस्था में चीनियों ने उन्हें बंदी बना लिया. उपचार के दौरान चीन में ही वे शहीद हो गए! उनके प्राक्रम का सम्मान करते हुए उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया. उनकी प्रतीमा के पास ही चार मटकों में शहीदों के खून से सनी मिट्टी रखी हुई है. इसी वार मेमोरियल के प्रांगन में हर शाम लाइट एंड साउंड प्रोग्राम होता है. शहीदों की वीर गाथा हमने भी सुनी..!
दो खूबसूरत लड़कियों का जासूसी ढ़ाबा..!
अरुणाचल की इन वादियों में शहीद हुए अपने वीर सैनिकों की यादें संजोए हम तवांग से वापस लौट रहे हैं गुवाहाटी की ओर. मुङो एक ऐसे रास्ते का पता चला है जिससे केवल दो दिन में हम गुवाहाटी पहुंच जाएंगे क्योंकि बोमडीला के आगे रूपा से एक रास्ता ओरांग की ओर जाता है जो अपेक्षाकृत ठीक है. रास्ते से हमें 1962 की एक यह कहानी भी याद आ गई कि हमले से पूर्व चीन ने इस इलाके में किस तरह की तैयारी की थी..!
चीन ने यहां चप्पे-चप्पे पर अपने जासूस फैला दिए थे. उस जमाने में भारत सरकार की चूंकि इस इलाके में अच्छी पैठ नहीं थी इसका फायदा चीनियों ने उठाया था. चीन के जासूस चप्पे-चप्पे पर थे. भारत के हर मूवमेंट का उन्हें पता चल रहा था. 20 अक्टूबर के पहले उन्होंने नामका चू वैली में बहुत से कैमरामैन को तैनात कर दिया था जहां से चीनियों को भारत पर हमला शुरु करना था. उन्होंने हजारों तिब्बतियों को पोर्टर के रूप में नौकरी पर रख लिया था. खाद्य सामग्री और हथियार बड़े पैमाने पर जमा कर लिए थे. यहां तक कि भारतीय सैनिकों के लिए 3000 क्षमता वाला जेल भी तैयार कर लिया था. ब्रिगेडियर जे.पी. दलवी ने अपनी किताब में जिक्र किया है कि उनके साथ पोर्टर के रूप में चलने वाला एक व्यक्ति बोर्डर के पास जाकर गायब हो गया. जब उन्होंने पूछा कि वह कहा गया तो पता चला कि वो उस पार चला गया है. दलवी को जब चीन में बंधक बना कर रखा गया था तब उन्हें चीनियों ने बताया कि उनकी हर हरकत की खबर चीनियों को मिल रही थी.
एक दिलचस्प कहानी यह है कि तेजपुर से तवांग के बीच में बोमडीला के पास दो खूबसूरत लड़कियां ढ़ाबा चलाती थीं. वहां हमारे सैनिक चाय के लिए रुकते और जाहिर सी बात है कि लड़किययां सैनिकों की बातचीत सुनती रहती थीं. बाद में पता चला कि वे चीन के लिए जासूसी कर रही थीं. यह तो एक कहानी सामने आई थी, लेकिन ऐसे और भी कई तरीके चीनियों ने निश्चय ही अपनाए होंगे.
चीनियों ने जिन भारतीय सैनिकों को बंदी बनाया था, उनमें से बहुत से सैनिकों ने अपने संस्मणों में इस बात का जिक्र किया है कि जो लोग भारतीय सीमा में दिखे थे और स्थानीय तौर पर सेना के लिए काम कर रहे थे, वे बाद में युद्ध बंदी शिविर में दुभाषिए का काम कर रहे थे. मेजर दलवी ने अपनी किताब में इस बात का भी जिक्र किया है कि युद्ध के पहले से ही चीनी रेडियो सेट भारतीय सीमा के भीतर काम कर रहे थे.
सुकून की बात है कि आज स्थितियां बदल चुकी हैं. तिब्बत में जिस तरह से चीनियों ने कहर ढ़ाया है, उसने यहां के लोगों को भी चीनियों से भयभीत कर दिया है. दूसरी बात यह है कि भारतीय सेना अब यहां के लोगों के दिल में बसती है. उनकी रोजी रोटी से लेकर उनकी हर सुविधा का खयाल सेना रखती है. देश के दूसरे हिस्सों की तरह ही यहां के लोगों के दिल में भी हिंदुस्तान बसता है. वे अपने सैनिकों की जयजयकार करते नहीं थकते..!





on china boarder

सफर चीन बोर्डर तक पार्ट-4




सफर चीन बोर्डर तक
पार्ट-4
चीन बोर्ड पर सांस लेना भी कठिन हो रहा है..!
तवांग छोटा है लेकिन बेहदू खूबसूरत शहर है. हमने तय किया है कि पहले यहां से बुमला पास चलेंगे. तवांग हम कल घूमेंगे और आपको भी घुमाएंगे. तवांग पहुंचते ही हमने यहां के डिप्टी कमिश्नर ऑफिस में बुमला र्दे तक जाने के लिए अनुमति का आवेदन कर दिया था. आपको बता दें कि केवल अरुणाचल के इनर परमिट से काम नहीं चलता. बुमला तक जाने के लिए आपको डिप्टी कमिश्नर ऑफिस से पास बनवाना होता है जिस पर सेना के वरिष्ठ अधिकारी का कांउंटर साइन भी जरूरी है. हमे यह अनुमति मिल गई है. जिस गाड़ी को लेकर हम यहां आए हैं, वह भी बुमला तक नहीं जाएगी. दूसरी ऐसी गाड़ी की व्यस्था हमने कर ली है जो ऊंचे पहाड़ के पथरीले रास्ते पर चल सके.
अल सुबह हम बुमला के लिए रवाना हो गए हैं. बस कुछ किलो मीटर जाने के बाद ही भीषण चढ़ाई शुरु हो गई है. रास्ता बिल्कुल पथरीला है. ऐसा लग रहा है जैसे कमर ही टूट जाएगी लेकिन हमारा इरादा पक्का है. ड्रायवर दायीं ओर की समतल पहाड़ी की ओर इशारा करता है और कहता है कि यहां बहुत से भारतीय सैनिकों को चीनियों ने मार दिया था.
बीच में थोड़ी सी अच्छी सड़क मिली लेकिन कुछ ही मिनटों बाद फिर वही भीषण सड़क . तवांग से बुमला तक 37 किलो मीटर पहुंचने में हमें करीब तीन घंटे का वक्त लग गया. तवांग से बुमला की यात्र में पांकेंटांग के बाद हमें कोई पेड़ पौधा दिखाई नहीं दिया है. पहाड़ कहीं काले पत्थरों के हैं तो कहीं सफेद और छोटे पत्थरों वाले. बीच-बीच में सेना ने कैंटिन भी बना रखे हैं ताकि कोई पर्यटक आए तो उसे असुविधा न हो. यहां नाश्ते के लिए मोमो और समोसे है. गरमागरम चाय और गरम पानी मौजूद है. एक जगह हम भी रुकते हैं. आप चाहें तो यहां से जैकेट, जूते इत्यादी खरीद सकते हैं. याद के लिए कुछ मोमेंटो भी खरदी सकते हैं. रास्ते से गुजरते हुए मैं सैनिकों की आवाजाही देख रहा हूं. सैनिकों के साथ मुस्कुराहट बांट रहा हूं. रास्ते में पहाड़ों की गोद में बेहद कठिन परिस्थितियों में अपने सैनिकों को देखकर जज्बाती भी हो रहा हूं.
बेहद कठिन यात्र के बाद अंतत: हम बुमल पहुंच गए हैं. ऊंचाई है 5200 फीट. यहां सांस लेना कठिन हो रहा है. इसी बुमला पास से चीनियों ने तवांग पर कब्जा किया था. लड़ाई अक्टूबर और नवंबर के महीने में हुई थी जब यह इलाका बर्फ की चादर ओढ़ लेता है. हमारे सैनिकों के पास इस सर्दी से बचने के लिए ठीक से कपड़े भी नहीं थे, बर्फ में चलने के लिए अच्छे जूते नहीं थे. उन्हें जितना चीनियों ने मारा होगा, उससे ज्यादा तो मौसम की मार पड़ी होगी. आज बुमला तक सैनिकों को पहुंचाने के लिए उन्हें तीन पड़ावों पर 15-15 दिन रखा जाता है ताकि मौसम का अनुकूलन हो जाए. 1962 में तो सैनिकों को सीधे यहां भेज दिया गया था.
वाहन से उतरते ही मेरी नजर एक बोर्ड पर पड़ी जिस पर मुंबई हमले के वक्त शहीद हुए मेजर पी. यून्नीकृष्णन की तस्वीर और वीर गाथा लिखी हुई है. मैं समझ गया कि इस वक्त यहां 7 बिहार रेजिमेंट के सैनिक तैनात हैं. सैन्य बटालियन कहीं भी पोस्टेड हो, अपने वीर सपूतों को नहीं भूलती. यहां सैन्य अधिकारी आदरपूर्ण तरीके से अगवानी करते हैं. यह यहां का दस्तूर है. मुख्य द्वार से करीब 100 मीटर की दूरी पर बड़ा सा बोर्ड है जिस पर अंग्रेजी और चीनी भाषा में लिखा है-थैंक यू! सैन्य अधिकारी बता रहे हैं कि यह आपके आने के लिए तो थैंक्यू है ही, जब निर्धारित बैठक के लिए चीनी अधिकारी यहां आते हैं तब लौटते हुए यह धन्यवाद पढ़ते हैं इसलिए चीनी भाषा में भी हमने लिख रखा है. पहाड़ के ठीक किनारे एक बड़ा सा पत्थर है जिसके पास दो सैनिक दूरबीन लगाकर बैठे हैं. एक सैनिक देखना बंद करता है तो दूसरा शुरु कर देता है. इस पत्थर के आगे चीन है. दूरबीन से मैं भी उस पार चीन के पोस्ट को देख लेता हूं. मेरे सामने की यह सड़क उसी पोस्ट की ओर जा रही है. लेकिन क्या ये चीन है? नहीं, यह तिब्बत है जिसे चीन हजम कर गया है. कभी तवांग भी तिब्बत का ही हिस्सा हुआ करता था इसलिए चीन तवांग को अपना मानता है.
इसी सड़क से आए थे दलाई लामा
तवांग और तिब्बत के बीच बुमला पास से गुजरने वाली यह सड़क बहुत ऐतिहासिक है. सदियों से इसी मार्ग से व्यापार होता रहा है लेकिन जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया और दलाई लामा की जिंदगी खतरे में पड़ गई तो वे जान बचाने के लिए इसी मार्ग से भाग कर तवांग पहुंचे जहां असम राईफल्स के जवानों ने उन्हें सलामी दी थी. कहते हैं कि इसके बाद ही चीन ने भारत पर जल्दी हमला करने की ठानी. 1962 में इस मार्ग पर खून की नदियां बही थीं और उसके बाद आम लोगों के लिए यह मार्ग बंद हो गया. 2006 में व्यापार के लिए इसे फिर खोल दिया गया. यह पता नहीं कि कितना व्यापार इस मार्ग से होता है? अपनी यात्र के दौरान मुङो तो एक भी ऐसा वाहन दिखाई नहीं दिया जो सामान लेकर जा रहा हो या फिर आ रहा हो!
इस दुर्गम इलाके में भी हॉट लाइन?
बोर्डर पर अपने पत्थर के पार मैं चीन सीमा में कदम रख देता हूं. एक तस्वीर खिंचाना चाह रहा हूं. सैन्य अधिकारी कहते हैं कि कुछ कदम जा सकते हैं लेकिन ज्यादा दूर नहीं क्योंकि सामने वाले चीनी पोस्ट से भी हम पर नजर रखी जाती है. यहां से उनका इलाका शुरु होता है. यदि उनके इलाके में थोड़ा भी आगे गए तो हॉट लाइन पर तत्काल आपत्ति दर्ज कराते हैं. मैं नजर घुमाकर देखता हूं, वाकई यहां तो हॉट लाइन लगी हुई है! मैं महसूस कर रहा हूं कि आस पास के जो ऊंचे पहाड़ हैं, वे खाली नहीं हैं. हमारे सैनिक वहां जरूर तैनात हैं. .लेकिन ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. मैं सैन्य अधिकारी से पूछता हूं और वे मुस्कुरा देते हैं.
करीब डेढ़ घंटे पहले जब हम बुमला पास आए थे तब मौसम खुला हुआ था लेकिन अचानक बादलों ने जैसे हमला बोल दिया है. सर्दी बढ़ गई है. चीनी कब्जे वाला तिब्बत अब दिखाई नहीं दे रहा है. यह लौटने का वक्त है. बुमला पास पर करीब डेढ़ घंटे तक रुकना आसान नहीं है. एक-एक कदम चलना मुश्किल होता है क्योंकि इस जगह पर नीचे की तुलना में केवल 21 प्रतिशत ऑक्सीजन है. हम इसे महसूस कर रहे हैं. मैं तो इससे ज्यादा ऊंचाई पर जा चुका हूं इसलिए थोड़ा कम परेशान हूं लेकिन थोड़ी परेशानी तो है. जिस सैन्य अधिकारी के साथ मैं घूम रहा हूं, वे बता रहे हैं कि यदि रोज कुछ घंटे वॉलीवाल न खेलें तो सीना इतना जकड़ जाता है कि रात का खाना भी न खा सकें! वाकई यहां रहना मुश्किल है. मैं अपने सैनिकों की हिम्मत और बहादुरी को सलाम करता हूं.
माधुरी दीक्षित के दीवानों ने झील का नाम ही बदल दिया!
बुमला पास से नीचे उतरते हुए सांस लेना थोड़ा आसान होने लगा है लेकिन तभी ड्रायवर ने सावधान कर दिया कि वाय जंक्शन से हम फिर ऊपर की ओर चलेंगे. वाय जंक्शन वो जगह है जहां से एक रास्ता बुमला पास की ओर और दूसरा रास्ता माधुरी लेक की ओर जाता है. दूरी बहुत तो नहीं है लेकिन पथरीला रास्ता इसे दूर बना देता है. गाड़ी ऐसे हिलती है जैसे आपकी हड्डियों के सारे जोड़ों की परीक्षा ले रहा हो!
माधुरी लेक के बारे में पहले पढ़ चुका हूं और 1996 में बनी फिल्म कोयला में इसे देख भी चुका हूं लेकिन उस झील के किनारे खड़े होकर उसे देखने का उतावलापन गाड़ी के सारे झटकों को बर्दाश्त करने की शक्ति दे रहा है. लीजिए, फिलहाल हम नूरानांग फॉल के पास आ गए हैं. करीब 100 मीटर की ऊंचाई से गिरते इस जलप्रपात को देखकर ही दिल बाग बाग हो उठा. पानी की लहराती बूंदें किसी को भी तरोताजा कर दें! इस जलप्रपात को भी फिल्म कोयला में फिल्माया गाया था. अभिभूत हो गया हूं इस जलप्रपात से लेकिन वक्त तेजी से बीत रहा है और माधुरी लेक तक पहुंचने की जल्दी है. हम कुछ फोटो खींचते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. मैं ड्रायवर से यह जानना चाहता हूं कि माधुरी दीक्षित यहां तक पहुंची कैसे? नाजुक बदन हसीना को बड़ी दिक्कत हुई होगी? ड्रायवर हंसने लगा! उसकी बात मुझे सटीक लगी-‘तवांग तक तो हेलिकॉप्टर है ही, बाकी किसी महंगी, लक्जरी गाड़ी में आई होंगी साहब!’ खैर, फिलहाल तो हम माधुरी दीक्षित को भुलाकर खुद को संभालने में लग गए क्योंकि रास्ता विकट था और लग रहा था कि जरा सा चूके तो नीचे दहाड़ती नदी में जा गिरेंगे या किसी खाई में दफन हो जाएंगे. यहां तो यदि दुर्घटना हो जाए तो शरीर के टुकड़े तलाशना भी मुश्किल होगा. इधर मैं अपने ड्रायवर को देखकर हैरान था कि वह किस तरह से गाड़ी को संभाल रहा है और संकड़ी सी पगडंडी नुमा सड़क पर यदा कदा आने वाली दूसरे वाहनों से भी बच रहा था! अब मेरी समझ में आ रहा था कि तवांग से जो गाड़ी और ड्रायवर लेकर हम आए थे, उसे यहां आने की इजाजत क्यों नहीं मिली!
और तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद, भीषण झटके खाते हुए हम आ पहुंचे हैं एक खूबसूरत झील के किनारे. यह हिंदुस्तान की एकमात्र झील है जहां सूखे पेड़ों की ठूंठ अभी भी मौजूद है जो इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है. दरअसल 1950 में जबर्दस्त भूकंप के बाद आए जलजले में यह खूबसूरत झील बन गई जिसे संग्त्सर त्सो कहा जाता है. स्थानीय भाषा में त्सो का अर्थ झील होता है. 1996 तक स्थानीय और बाहरी लोग इसे इसी नाम से जानते थे लेकिन कोयला फिल्म की शूटिंग के लिए माधुरी दीक्षित क्या आईं, दीवानों ने इस झील का नाम ही बदल दिया! अब संग्त्सर त्सो कम और माधुरी लेक के नाम से ज्यादा जाना जाता है.
1962 की लड़ाई में इस झील के किनारे भी जबर्दस्त मुठभेड़ हुई थी. हमारे सैनिकों ने अदम्य बहादुरी का परिचय दिया था लेकिन हालात ऐसे थे कि चीन ने हमें यहां भी परास्त कर दिया था. हमारे बहुत से सैनिक इस इलाके में शहीद हुए थे और बहुत से सैनिकों को चीनियों ने बंधक बना लिया था. कहते हैं कि झील के किनारे के पहाड़ की ओर से चीनी सैनिक यहां आ गए थे और हमारी टुकड़ी पर हमला बोल दिया था. आज इस जगह पर भारतीय सेना ने एक खूबसूरत सा गार्डन बना रखा है और लजीज व्यंजनों से पर्यटकों का स्वागत करने के लिए एक कैंटिन भी खोल रखी है. गरमा गरम समोसे और मोमो का आनंद आप ले सकते हैं. अपनी सेना के इस अंदाज से यहां आने वाले पर्यटक उनकी मुरीद हो जाते हैं. अभी यहां सेना के वरिष्ठ अधिकारी आने वाले हैं इसलिए यहां तैनात जवान ज्यादा व्यस्त हैं, फिर भी पर्यटकों का पूरा खयाल रख रहे हैं.
मैं झील किनारे घूम रहा हूं और तलाश रहा हूं कि कहीं ‘गोल्ड डक’यानि सुनहरे रंग का बत्तख दिख जाए. मेरे ड्रायवर ने रास्ते में बताया था कि आपको यदि गोल्डेन डक दिख गया तो आप भाग्यशाली हैं! उसने यह भी बताया था कि ये डक चीन से तैरते हुए यहां पहुंच जाते हैं. तो क्या इस झील का फैलाव चीन तक है? मेरे इस सवाल का जवाब ड्रायवर के पास नहीं है लेकिन वह कहता है कि पानी के स्नेत तो मिले ही हुए हैं न सर! ..और अचानक ड्रायवर की ही नजर गोल्डन डक पर पड़ जाती है. हम आहिस्ता-आहिस्ता उस किनारे की ओर बढ़ते हैं जहां से गोल्डेन डक को नजदीक से देखा जा सकता है. उम्दा..! बेहद उम्दा..! ऐसा बत्तख तो मैंने तस्वीरों में भी नहीं देखा है. मैं अपना कैमरा संभालता हूं लेकिन वह लगातार तैर रहा है और अब भी काफी दूर है इसलिए तस्वीर लेने में कठिनाई हो रही है. फिर भी कुछ तस्वीरें तो मैंने उतार ही लीं!
इस रमणीय झील से दूर जाने की इच्छा नहीं हो रही है. काश! यहां रुकने की व्यवस्था होती! लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए जाना पड़ेगा. तवांग तक की वापसी यात्र रूह कंपा रही है लेकिन क्या करें? लौटना तो है ही! एक जानकारी आपको और दे दें कि जिस बुमला-तवांग मार्ग पर हम अभी सफर कर रहे हैं, वह कभी व्यापारियों की पगडंडी हुआ करती थी लेकिन चीन ने 1962 में जब भारत पर हमला किया तो बुमला और तवांग के बीच चीनी सेना ने केवल दो हफ्ते में 30 किलो मीटर ऐसी सड़क बना ली जिस पर उसके वाहन चल सकें. बहरहाल, तवांग पहुंचते-पहुंचते शाम हो गई है. घटाओं ने तवांग को अपने आगोश में ले लिया है. (कल हम आपको ले चलेंगे चौथे दलाई लामा के घर)

सफर चीन बोर्डर तक पार्ट-3




सफर चीन बोर्डर तक
पार्ट-3
इस अकेली जगह पर कुछ ही घंटों में हमारे 930 सैनिक
शहीद हो गए, 1060 को चीनियों ने बंदी बना लिया
दिरांग में पूरी रात नदी की दहाड़ सुनते रहे. इस नदी को सैलानी तो दिरांग चू के नाम से जानते हैं लेकिन मूल रूप से यह नामका चू नदी है. तिब्बती में चू का मतलब नदी होता है. वैसे भी अरुणाचल प्रदेश में तो नदियों का जाल बिछा हुआ है. आप चाहे कितने भी पहाड़ पार कर जाएं, सड़क के किनारे-किनारे कोई न कोई नदी गरजती, उफनती दिखाई दे ही जाती है. मैंने कहीं पढ़ा था कि इस नामका चू नदी के किनारे भी चीनी और भारतीय सैनिकों में जबर्दस्त लड़ाई हुई थी जिसमें हमारे सैकड़ों सैनिक शहीद हो गए थे.
मनोहारी जंगल और गरजती नदियों का लुत्फ लेते हुए हम आगे बढ़े जा रहे हैं. दोनों ओर इतनी खूबसूरती है कि समझ में नहीं आ रहा है कि किस ओर के नजारे का आनंद लें? अचानक सड़क के दायें मैं एक वार मेमोरियल देखता हूं. फूलचंद रुकना..! मैं ड्रायवर को गाड़ी रोकने के लिए कहता हूं. पीछे लौटते ही मैं देखता रह जाता हूं. ये जगह न्यूकमाडोंग है. सेंजे यहां से कुछ ही दूरी पर है. 1962 की लड़ाई में शहीद हुए सैनिकों और सैन्य अधिकारियों के नाम वाली पट्टिकाएं कतार से लगी हुई हैं. मेरी आंखें नम हो जाती है. सोच रहा हूं- क्या इतने लोग इस एक जगह पर शहीद हुए थे?
बायीं ओर एक कमरे की चौकी पर एक युवा सैनिक तैनात है. मैं उस युवा की ओर मुड़ता हूं लेकिन वह इशारा करता है कि पहले वार मेमोरियल देख आइए, फिर बात करेंगे. पूरी श्रद्धा के साथ मैं वार मेमोरियल की पगडंडियों पर आगे बढ़ रहा हूं. मैं एक पट्टिका के सामने खड़ा हो जाता हूं. इस पर लिखा है-‘तवांग के दुश्मनों के हाथ में चले जाने के बाद 62 इंफैंट्री ब्रिगेड को पीछे हटने और दिरांग में रुकने के आदेश दिए गए थे. जब भारतीय सेना पीछे हट रही थी तो चीनी सेना ने न्यूकमाडोंग और सेंजे के पास एंब्यूस बिछा रखा था. बायीं तरफ भूटान की ओर से और दायीं तरफ चीन की ओर से चीनी सैनिक पहले ही न्यूकमाडोंग पहुंच चुके थे. पीछे लौट रही भारतीय सेना पर चीनी सैनिकों ने अचानक हमला बोल दिया. हमारे सैनिक नीचे थे और चीनियों ने ऊपर से हमला किया. वह 18 नवंबर 1962 की तारीख थी और इस एक जगह पर महज कुछ घंटों में हमारे 862 सैनिक, 30 जूनियर कमांडिंग ऑफिसर और 38 वरिष्ठ अधिकारी यानी कुल 930 लोग शहीद हो गए थे. 1015 घायल सैनिकों, 28 जूनियर कमांडिंग आफसरों और 17 वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को चीनी सैनिकों ने बंदी बना लिया था.’
मैं शहीदों के नाम पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन कितनों के नाम पढूं? शहीदों की इतनी बड़ी संख्या? जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही तो कहा था कि चीनियों ने हमारे पीठ में छूरा भोंका है! लेकिन मैं सोच रहा हूं कि क्या केवल चीन ही जिम्मेदार है? क्या वो लोग नहीं जिन्होंने चीन की चाल समझने में गलती कर दी और भारतीय सैनिकों को लड़ने की बेहतर सुविधाएं नहीं दीं? बहरहाल, शहीदों के प्रति श्रद्धा से मेरा सिर झुका है और गुस्से में खून खौल रहा है. मैं उस सैनिक की ओर लौटता है जो सड़क के बायीं ओर तैनात है. वह उस दौर की कहानी सुनाने लगा है कि किस तरह चीन ने भारतीय सैनिकों पर पीछे से हमला किया था. जिस मार्ग के बारे में कोई सोच नहीं सकता था, उस मार्ग से चीनी सैनिक न्यूकमाडोंग पहुंच गए थे. सैनिक बता रहा है कि यदि वार मेमोरियल के ऊपर वाले पहाड़ पर आप जाएंगे तो आज भी बहुत से हथियारों के अवशेष रखे हुए हैं. गोलियों के खोखे भी आपको मिल जाएंगे. सैनिक बता रहा है कि हमारे सैनिक लड़े तो बहुत बहादुरी से लेकिन हालात ऐसे थे कि वे विजयी नहीं हो पाए! यहां सबके किस्से तो नहीं लिखे हैं लेकिन निजी बहादुरी की कई मिसालें हैं.
मैं सहज ही पूछ बैठता हूं कि क्या इस बार चीन हमले की हिम्मत करेगा? वह मुस्कुराता है और कहता है कि अब लड़ाई के तरीके बदल गए हैं. अब केवल एक-दूूसरे के सैनिक ही नहीं लड़ते हैं. मिसाइलों से हमले होते हैं. नागरिकों को बहुत क्षति होती है. लड़ाई होने की आशंका कम ही है. चीन भी जानता है कि अरुणाचल से लेकर लद्दाख तक भारतीय रक्षा पंक्ति बहुत मजबूत है. इसके अलावा अब हर रास्ते पर हमारी नजर है. हमारी सीमा में घुसने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता!
हमने सैनिक को शुक्रिया कहा और अपनी कार की ओर मुड़े. तभी उस सैनिक ने कहा कि आप आग जाएंगे तो जसवंत गढ़ में वार मेमोरियल जरूर देखिएगा..! साहब ने अप्रतीम बहादुरी का परिचय दिया था. चलते चलते उसने जसवंत सिंह की दो महिला दोस्त शीला और नूरा की एक कहानी भी सुनाई. यह कहानी आपको बताएंगे लेकिन जसवंत गढ़ पहुंचने के बाद..!
फिलहाल हम चल पड़े हैं जसवंत गढ़ की ओर लेकिन उससे पहले हमें गुजरना है शीला पास से जिसकी ऊंचाई है करीब 13700 फीट. हालांकि इस ऊंचाई की मुङो कोई खास चिंता नहीं है क्योंकि लद्दाख में 18 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई वाले खारडूंगला पास पर मैं जा चुका हूं. अपने सैनिकों की वीर गाथाओं को याद करते हुए मैं शीला पास (दर्रा) की ओर लगातार ऊंचाई की तरफ बढ़ रहा हूं! ऊंचाई है तो सांस लेने में तकलीफ स्वाभाविक है लेकिन मैं लगातार पानी पी रहा हूं ताकि शरीर में ऑक्सीजन की कमी नहीं हो! शीला पास पर रुकता हूं, कुछ तस्वीरें खींचता हूं. यहां यह किवदंती है कि इस पहाड़ का नाम जसवंत सिंह की महिला मित्र शीला के नाम पर रखा गया है. दूसरी मित्र नूरा के नाम पर एक पहाड़ है नूरानांग, वह यहां से दिखाई देता है. कहते हैं कि अभी भी नूरा का घर वहां है! शीला और नूरा दोनों ही सगी बहने थीं. चलिए अब आगे बढ़ते हैं!
उस महावीर ने चीनियों से हथियार छीना और
72 घंटे में उनके 300 सैनिकों को मार गिराया
सीला दर्रा से नूरानांग होते हुए हम जसवंत गढ़ आ पहुंचे हैं. मेरा ड्रायवर फूलचंद बता रहा है कि यहां मिलिट्री की ओर से चाय की व्यवस्था है, बिल्कुल मुफ्त! आप चाहें तो मिलिट्री कैंटीन से समोसा खरीद सकते हैं. समोसा बड़ा स्वादिस्ट बनाते हैं ये मिलिट्री वाले. पहाड़ों के बीच घनचक्कर रास्ते के कारण कुछ खाने की इच्छा नहीं हो रही है. मैं सड़क के बायीं ओर बने जसवंत स्मारक की तरफ बढ़ जाता हूं. मैंने उनके बार में खूब पढ़ा है. मेरा सौभाग्य है कि मुङो धरती के उस टुकड़े पर आने और उस मिट्टी को प्रणाम करने का मौका मिला है जहां जसवंत सिंह रावत ने असाधारण शौर्य का परिचय दिया. मैं मिट्टी को प्रणाम करता हूं. मुङो उस मिट्टी में वीर रस घुला हुआ सा लगता है. उनकी प्रतिमा देखकर सिर से गर्व से ऊंचा हो जाता है. भीतर उनकी तस्वीरें लगी हैं. उन्होंने जो कपड़े पहने थे, वो रखा है. दूसरे साजो सामान भी हैं.
मैं उनके बारे में सोच रहा हूं. हिमालय के एक छोर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के इस 22 वर्षीय सपूत ने हिमालय के इस दूसरे इलाके में आकर देश की रक्षा के लिए खुद को बहादुरी के साथ कुर्बान कर दिया. अचानक मेरी नजर शो केश में रखे मिडियम मशीन गन की ओर चली गई! अरे ये तो वही मिडियम मशीन गन है जिससे उन्होंने चीनियों के छक्के छुड़ा दिए थे. 1962 की लड़ाई में 4 गढ़वाल राइफल्स के सिपाही जसवंतसिंह रावत की कंपनी के पास हथियार और गोलियां जब कम पड़ने लगीं तो कंपनी को पीछे हटने के आदेश दिए गए लेकिन जसवंत सिंह ने पीछे हटने से मना कर दिया. उन्होंने देखा कि चीनियों की एक एमएजी (मीडियम मशीन गन) भारतीय सैनिकों को सबसे ज्यादा निशाना बना रही थी. लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और राइफल मैन गोपाल सिंह गुस्सैन को साथ लेकर जसवंत सिंह चुपके से रेंगते हुए उस चीनी बंकर के पास पहुंच गए जहां से यह एमएमजी लगातार गोलियां बरसा रहा था. केवल 12 मीटर की दूरी से उन्होंने बंकर के भीतर ग्रेनेड फेंका. इसके साथ ही इन तीनों ने बंकर पर हमला बोल दिया और देखते ही देखते चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया. जसवंत ने एमएमजी अपने हाथ में लिया और दोनों साथियों के साथ रेंगते हुए अपने पोस्ट की तरफ वापस लौटे लेकिन लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और राइफल मैन गोपाल सिंह गुस्सैन चीनी गोलियों के शिकार हो गए. अकेले बचे 22 वर्षीय जसवंत सिंह ने गजब का मोर्चा संभाला और चीनियों के एमएमजी से ही चीनियों को मौत के घाट उतारना शुरु किया. 10 हजार फिट की ऊंचाई पर उन्होंने अकेले ही चीन की पूरी फौज को 72 घंटे तक रोके रखा. 17 नवंबर को जब वो शहीद हुए तब तक वे 300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार चुके थे.
उनकी अप्रतीम बहादुरी के लिए उन्हें मरणोप्रांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. उनके दोनों साथियों नेगी और गुस्सैन को मरणोप्रांत वीर चक्र से नवाजा गया. उनकी बटालियन को ‘बैटल ऑफ ऑनर नूरानांग’ के पदक से सम्मानित किया गया. 1962 की लड़ाई में वीरता का पदक पाने वाली यह अकेली बटालियन थी. जसवंत सिंह की बहादुरी के सम्मान स्वरूप सेना ने मरणोप्रांत भी उनकी सेवा बरकरार रखी. रिटायर होने की उम्र तक उनके परिवार को तनख्वाह मिलती रही, उन्हें जिवित मानकर प्रमोशन भी दिया गया. तवांग इलाके के लोगों की यह मान्यता है कि शहीद होने के बाद वे संत हो गए और उस पूरे इलाके की अब भी रक्षा कर रहे हैं.
जसवंत सिंह के बारे में इलाके में कई किवदंतियां मौजूद हैं. न्यूकमाडोंग में जिस सैनिक से मेरी मुलाकात हुई थी, उसने कहानी कुछ ऐसी सुनाई थी-‘जसवंत सिंह की दो महिला मित्र थीं. एक का नाम था शीला और दूसरे का नाम था नूरा. दोनों बहनें थीं. चीनियों को 70 घंटे रोके रखने में शीला और नूरा ने जसवंत सिंह रावत की बड़ी मदद की थी. चीनी सैनिक यह समझ रहे थे कि पोस्ट पर भारत के बहुत से सैनिक हैं. एक दिन उन्होंने नूरा के पिता को पकड़ लिया और पूछा कि ऊपर कितने सैनिक हैं? जब उन्हें यह पता चला कि ऊपर तो एक ही सैनिक है तो उन्होंने जोरदार हमला बोला और रावत शहीद हो गए. कहते हैं कि नूरा को नग्न करके चीनी सैनिकों ने व्यभिचार किया और उसकी हत्या कर दी. उसी के नाम पर पहाड़ को नूरानांग कहा जाने लगा. तवांग की स्थानीय भाषा में नांग का मतलब नग्न होता है. शीला के नाम पर एक पहाड़ को सेला नाम दिया गया.’ पता नहीं इस कहानी में कितनी सच्चई है लेकिन तवांग के आपसाक के लोग भी यही कहानी बताते हैं.
करीब डेढ़ घंटे तक हम जसवंत गढ़ में रुके. वहां बहुत से बंकर अभी भी मौजूद हैं. उन्हें देखकर तो यही लगता है कि शायद 1962 के भी कुछ बंकर हों लेकिन दो बंकरों के पास लिखा है कि इन बंकरों का 1962 की लड़ाई से कोई संबंध नहीं है. इन्हें 1980 में तैयार किया गया है. आप जब तक पास नहीं जाते तब तक आपको अंदाजा भी नहीं होता कि यहां बंकर भी है. हमने कुछ बंकरों का भीतर से जायजा लिया लेकिन देश की सुरक्षा की दृष्टि से बंकर के भीतर का खाका खींचना ठीक नहीं है इसलिए हम आपको भीतर नहीं ले जा सकते! बस इतना जान लीजिए कि इस इलाके में बंकर ही बंकर नजर आते हैं! समारिक दृष्टि से जसवंत गढ़ का बहुत महत्व है!
हमें तवांग पहुंचने की जल्दी हो रही है फिर भी हमने सैनिकों को सम्मान देने के लिए मुफ्त की चाय पी. अपने सैनिकों को सलाम किया और आगे बढ़ चले. शाम होने में अभी काफी वक्त है लेकिन मेघों ने शाम जैसा माहौल बना दिया है. बहरहाल, शाम होते होते हम तवांग आ पहुंचे हैं. आते ही हमने पहले इस बात की व्यवस्था की कि कल हर हाल में चीन बोर्डर बुमला पास जाने की अनुमति मिल जाए. (कल चीन बोर्डर चलेंगे, साथ बने रहिए..!)

सफर चीन बोर्डर तक पार्ट-2




सफर चीन बोर्डर तक पार्ट-2
कल आपने हमारे साथ अरुणाचल के भालुकपोंग तक की यात्रा की थी. अब चलिए अरुणाचल की दुर्गम पहाड़ियों में..
तेजपुर मैदानी इलाका है इसलिए वहां गर्मी थी लेकिन भोलुकपोंग पहाड़ों की गोद में बसा है इसलिए अच्छी खासी सर्दी है..! सुबह मेरी नींद खुली और खिड़की के पार देखा तो लगा कि निकलने का वक्त हो गया है. हमने तय किया था कि सुबह छह बजे तक यहां से जरूर निकल जाएंगे. मैंने घड़ी देखी और चौंक गया! अभी तो केवल साढ़े चार बजे हैं और सामने का पहाड़ दिखाई दे रहा है! बाद में पता चला कि यहां रात का धुंधलका जल्दी छंट जाता है. सुबह जल्दी हो जाती है.
खैर, हमें जल्दी थी आगे बढ़ने की. सुबह सात बजे हम निकल पड़े सफर पर. भोलुकपोंग से तवांग एक दिन में पहुंचना संभव नहीं था इसलिए हमने पहले ही तय कर लिया था कि आज की रात दिरांग रुकेंगे. ड्रायवर की चेतावनी का सम्मान करते हुए हमने भरपूर पानी और खाने का कुछ सामान अपने साथ रख लिया था. यात्र अब दुर्गम थी. बस ऊंचाई पर चढ़ते चले जाना था. रास्ते में लैंड स्लाइडिंग का भी खतरा था. सड़क कुछ दूर तो ठीक ठाक मिली लेकिन जब रास्ता दुर्गम होता चला गया तो चिंता होने लगी कि ऐसी खराब सड़क पर इतनी लंबी यात्रा कैसे कर पाएंगे? लेकिन मन पक्का था..कितनी भी परेशानी आए, भारत-चीन की सीमा पर जरूर पहुंचेंगे! रास्ते में कहीं कोई बस्ती नहीं. ट्रेफिक के नाम पर महज कुछ गाड़ियां जो या तो सेना की थीं या फिर तवांग और तेजपुर के बीच चलने वाली मझोले कद की गाड़ियां. इस अत्यंत दुर्गम रास्ते पर भी ये गाड़ियां फर्राटे से गुजरती हैं कि दिल दहल जाता है. उन गाड़ियों में बैठे लोगों का क्या हाल होता होगा? मेरा ड्रायवर बता रहा है कि गाड़ियां सुबह 4 बजे तेजपुर से निकलती हैं और रात आठ बजे तवांग पहुंच जाती हैं! स्थानीय लोगों के आने जाने का यही एक मात्र जरिया है. पहाड़ों में गड्ढों भरे दुर्गम रास्ते पर 16 घंटे का सफर कितना कष्टदायी होता होगा, यह केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है. हमारे आपके जैसे मैदानी लोग ऐसा सफर नहीं कर सकते.
हम रास्ते के बारे में सोच ही रहे थे कि पहला संकट सामने आ गया! सामने देखा तो पहाड़ का एक टुकड़ा टूट कर सड़क पर आ गिरा था और बोर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के कर्मचारी और मजदूर रास्ता साफ करने में जुट गए थे. ड्रायवर ने बताया कि चिंता की बात नहीं है. एक-आध घंटे में रास्ता खुल जाएगा. यह तो यहां रोज का काम है! गाड़ी से बाहर निकलिए और नेचर का मजा लीजिए लेकिन पीले मच्छरों का ध्यान रखिएगा! मैं सतर्क हो गया! फूलचंद कौन से मच्छरों की बात कर रहा है? गाड़ी से बाहर निकले हुए कुछ मिनट ही बीते होंगे कि मच्छर महाराज मुझे नजर आ गए. वे मुझ पर ही निशाना साध रहे थे. मैं सतर्क हो गया! फूलचंद ने कहा कि टहलते रहिए तो ये नहीं काट पाएंगे. उसके बाद से मैं घंटे भर लगातार टहलता रहा. वहां सेना की कुछ गाड़ियां रुकी हुई थीं. सैनिकों से बातचीत होने लगी. पता चला कि लद्दाख में चीन सीमा पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमने सामने भिड़ंत का जो वीडियो आया है, वैसे पहले भी होता रहा है. सैनिक कह रहे हैं कि अब चीन ने यदि हमला करने की हिम्मत की तो मुंह की खाएगा! मैं महसूस भी कर रहा हूं कि हमारी सेना चप्पे-चप्पे पर छाई हुई है. 1962 में यहस्थिति नहीं थी. कुछ इलाकों में हमारे सैनिक जरूर थे लेकिन आज की तरह इतनी बड़ी संख्या में नहीं! उस समय तेजपुर से तवांग तक सड़क थी नहीं. कुछ कच्ची सड़क थी और ज्यादातर पैदल ही दूरी तय करनी होती थी. इसका मतलब था कि तेजपुर से सैनिकों को तवांग तक पहुंचने में कम से कम 10 दिन तो लग ही जाते थे. रोड बनाने का काम शुरु ही हुआ था. सीमाई इलाके में सड़क बनाने और सुधारने के लिए बोर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन का गठन ही 1960 में किया गया था. अभी भले ही रोड खराब हो लेकिन वाहन चलने की स्थिति तो है.
उबड़ खाबर सड़क पर आगे बढ़ ही रहे थे कि टेंगा के पास हमें एक बड़ा ही खूबसूरत नाग मंदिर मिला. इस पर लिखा था 91, आरसीसी ग्रेफ ! मुझे पता था कि ग्रेफ दरअसल जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स का संक्षिप्त नाम है और यह बोर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन का हिस्सा है. हम मंदिर के पास रुक गए. बोर्ड पर एक दिलचस्प कहानी लिखी थी. कहानी ऐसी है कि जब टेंगा नाम की इस जगह के पास 1966 में भोलुकपोंग-तवांग मार्ग का निर्माण कार्य चल रहा था तब किसी मजदूर ने एक नाग को मार दिया. इससे नागिन क्रोधित हो गई और मजदूर जब भी पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करते तो भयंकर लैंड स्लाइडिंग होने लगता था. सांपों के काटने की घटनाएं बढ़ने लगीं. ऐसा लगने लगा कि काम आगे बढ़ ही नहीं पाएगा तब कमान अधिकारी मेजर के. रामास्वामी ने यहां एक मंदिर का निर्माण कराया. इसके बाद स्थिति शांत हुई और सड़क निर्माण का काम आगे बढ़ा. आधुनिक विचारों वाले हम लोग इसे भले ही अंधविश्वास कहें लेकिन यहां हर साल नागपंचमी के अवसर पर बड़ा मेला लगता है. दूर-दूर से लोग आते हैं.
आगे बढ़े और भेखू नाम की एक छोटी सी जगह पर सड़क किनारे चाय पीने को रुक गए. चाय दुकान शोनम श्रृंग की है और यह जानकर वे खुश हुए कि हम पत्रकार हैं. मैंने उनसे सवाल पूछ दिया कि क्या 1962 में यहां भी चीनी आ गए थे? कहने लगे-‘मैं तो उस साल पैदा ही हुआ था लेकिन माता पिता से कहानियां जरूर सुनी हैं. चीनी सैनिकों ने यहां के लोगों से कहा था कि तुम तो हमारे लोग हो. किसी को नहीं मारा था. जब वे लौटने लगे तो उन्होंने एक पार्टी की थी. हर गांव के प्रमुख लोगों को बलाया था और कुत्ते-बिल्ली-गाय सहित दूसरे जानवरों को मारकर सब्जी बनाई थी. बड़ी पार्टी हुई थी. जाते-जाते सभी को चीन का एक पर्चा दिया था कि अब तुम सब हमारे लोग हो. हम फिर आएंगे तब हमें यह पर्ची दिखाना. बाद में ज्यादातर लोगों ने भारत सरकार को वह पर्ची सौंप दी थी. कुछ लोगों ने छिपा कर रख भी लिया कि पता नहीं फिर कभी चीन आ गया तो?
बहरहाल, शाम करीब 5 बजे हम दिरांग पहुंच गए. अब सर्दी बढ़ने लगी थी और हम लिहाफ में घुसने को बेताब हो रहे थे. गरजती हुई पहाड़ी नदी के ठीक किनारे हमने एक होटल में अपना ठिकाना ढूंढा. अगली सुबह जल्दी निकलने का कार्यक्रम था इसलिए दिरांग की मोनेस्ट्री को तत्काल देख लेना ही उचित था. कलाकृति का अत्यंत शानदार नमूना है दिरांग मोनेस्ट्री. (कल चलेंगे तवांग, बने रहिए हमारे साथ..!)

Saturday, November 18, 2017

सफर चीन बोर्डर तक..!

सफर चीन बोर्डर तक..!

सरकारी तौर पर डोकलाम में 73 दिनों का तनाव समाप्त हो गया है. सरकार मानती है कि युद्ध के बादल फिलहाल छंट गए हैं लेकिन देश के सेना अध्यक्ष  ने साफ तौर पर कहा है कि भारत को सावधान रहने की जरूरत है. उत्तर में चीन ने आंखें दिखाना शुरु किया है तो युद्ध की स्थिति बनने में देर नहीं लगेगी! यह युद्ध पूरी सीमा पर हो सकता है, अक्साई चीन से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक. दरअसल सेना अध्यक्ष विपिन रावत को पता है कि चीन दिखाता कुछ है और करता कुछ और है. 1962 के युद्ध में उसने ऐसी ही चालाकी दिखाई थी. वह संकेत देता रहा कि भारत पर हमला नही करेगा लेकिन अचानक 10 अक्टूबर 1962 को अपनी सीमा के भीतर पेट्रोलिंग कर रहे 10 भारतीय सैनिकों को उसने मौत के घाट उतार दिया था. इसघटना के केवल 10 दिन बाद उसने पूरी शक्ति से हमला किया और केवल एक महीने में हमारे हजारों सैनिकों को मारते हुए उसने पूरे अरुणाचल प्रदेश को अपने कब्जे में कर लिया था. वह तो भला हो अमेरिका का जिसने हस्तक्षेप के लिए कदम बढ़ाए और चीन को चेतावनी मिली तो वह वापस लौटा लेकिन पूरी तरह नहीं. आज भी थगला और तगला नाम के दो सबसे ऊंचे पहाड़ों पर उसी का कब्जा है जिसे उसने 1962 के युद्ध में सबसे पहले जीता था. चीन बोर्डर पर तनाव की स्थिति को देखते हुए लोकमत समाचार ने यह तय किया कि हम उन इलाकों में जाएं जिस पर कभी चीन ने कब्जा किया हुआ था. आकलन करें मौजूदा हालात का और वैसे बुजुर्ग लोगों से मिलकर यह जानने की कोशिश करें कि 1962 में जब चीनी अरुणाचल में पहुंचे थे तब क्या-क्या हुआ था? हमें पता है कि यह यात्रा काफी कठिन है लेकिन हमारे भीतर एक रोमांच भी है..! हमारे साथ आप भी चलिए इस यात्रा पर..!

डिप्टी कमिश्नर ने कैदियों को भगा दिया, नोटों के बंडल जलवा दिए..!

असम के सबसे बड़े शहर गुवाहाटी से हमें निकले हुए करीब पांच घंटे हो चुके हैं और हम तेजपुर से गुजर रहे हैं. सड़क बहुत ठीक-ठाक नहीं है और हमारे वाहन चालक फूलचंद अली कह रहे हैं कि हम भोलुकपोंग में रुकेंगे. भोलुकपोंग मैं इससे पहले कभी नहीं आया हूं लेकिन यह नाम नया नहीं है. 1962 के युद्ध की कहानियों में इस छोटे से शहर का नाम कई बार आया है. चीन सीमा बुमला पास से भोलुकपोंग करीब 300 किलो मीटर दूर है लेकिन चीनी यहां तक पहुंच आए थे. हम बुमला पास तक की यात्र करेंगे लेकिन अभी हम जहां से गुजर रहे हैं, वहां की कहानी आपका सुनाता चलूं..

जब चीनी सैनिक भोलुकपोंग तक पहुंच गए तो ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया. तेजपुर से भोलुकपोंग की दूरी केवल 56 किलो मीटर है. तेजपुर के तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों को यही लगा कि जब चीनी सैनिक एक महीने से भी कम समय में भोलुकपोंग तक 300 किलो मीटर की अत्यंत दुर्गम यात्र कर सकते हैं तो 56 किलो मीटर की आसान दूरी तय करने में उन्हें कितना वक्त लगेगा? इस बीच तवांग, जांग और बोमडीला से लोकर भोलुकपोंग के शरणार्थी आसाम पहुंच चुके थे. चीनियों ने पहाड़ों में भारतीय सैनिकों की कब्रगाह बना दी थी. चीनी सैनिकों के तेजपुर शहर में घुसने की दहशत इतनी थी कि लोग तेजपुर से भी भागने लगे थे. कहा तो यह भी जाता है कि तेजपुर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने जेल के दरबाजे खोल दिए थे ताकि कैदी जान बचाकर भाग सकें और कोषागार में रखे भारतीय नोटों को जला दिया गया था ताकि नोट चीनी सैनिकों के हाथ में न आ पाएं. इतना ही नहीं लाउडस्पीकर से घोषणा कर दी गई थी कि लोग अपनी जान की सुरक्षा खुद करें. यह कहानी केवल कल्पना नहीं है बल्कि ब्रिगेडियर जे.पी. दलवी ने अपनी किताब हिमालयन ब्लंडर में इसकी चर्चा भी की है.

मैं तेजपुर रुकना चाहता था, कुछ पुराने लोगों को ढूंढ कर उनसे बात करना चाहता था लेकिन फिलहाल इतना वक्त नहीं है. मुङो फिलहाल अरुणाचल के पहले शहर भोलुकपोंग और फिर तवांग और उससे भी आगे चीन बोर्डर पर पहुंचने की जल्दी है. तेजपुर के आगे सड़क और खराब मिल रही है. ड्रायवर ने बता दिया है कि 56 किलो मीटर की यात्र में दो घंटे तो लग ही जाएंगे. गड्ढों भरी सड़क पर हिचकोले खाते हुए और रास्ते में हरियाली की चादर ओढ़े धान के खेतों का लुत्फ लेते हुए अंतत: शाम करीब 5 बजे हम भोलुकपोंग पहुंच गए. रास्ते में नामेरी नेशनल पार्क भी था. छोटे से भालुकपोंग शहर का थोड़ा सा हिस्सा आसाम और ज्यादातर हिस्सा अरुणचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले में पड़ता है. अरुणचाल का चेकपोस्ट शहर को दो हिस्सों में बांटता है. ड्रायवर ने गाड़ी रोक दी है और मुझसे कहा है कि मैं अपना परमिट चेकपोस्ट पर दिखाऊं. यहां मैं आपको बताना चाहूंगा कि अपने ही देश के इस अरुणाचल प्रदेश में घुसने के लिए हर भारतीय को ‘इनर लाइन परमिट’ की जरूरत होती है. अरुणाचल सरकार यह परमिट जारी करती है. मैंने इसके लिए ऑन लाइन आवेदन किया था. पहली बार अनुमति नहीं मिली थी लेकिन जब एक स्थानीय रिफरेंस के साथ दोबारा आवेदन किया तो इनर लाइन परमिट मिल गया था. चेकपोस्ट पर तैनात सशत्र सीमा बल (एसएसबी) के जवानों को मैंने अपना परमिट दिखाया. मेरे प्रोफेशन की कैटेगेरी में ‘जनर्लिस्ट’ लिखा है. दोनों जवान मुस्कुराए और कहा..चीन आ रहा है इसलिए आप लोग आए हैं? मैं भी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया. आज की रात हम भोलुकपोंग में रुकेंगे. 

जाहिर है, आपके मन में यह सवाल पैदा हो रहा होगा कि एसएसबी के जिन जवानों ने हमारा इनर लाइन परमिट चेक किया था वे आखिर हैं कौन? दरअसल 1962 में जब हम चीन से बुरी तरह हार गए थे तब हमने कुछ ऐसी तैयारी करने की सोची कि जो चीन के लिए चुनौतीपूर्ण हो. पहली बात तो इस पूरे इलाके में भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के एजेंटों का जाल बिछाने की थी ताकि चीन की हर हरकत की हमें जानकारी मिल सके. दूसरी जरूरत स्थानीय लोगों में सुरक्षा का भाव पैदा करने की थी. यह भी सोचा गया कि यदि चीन ने फिर हमला किया तो उसे जवाब कैसे दिया जाएगा? इन सारी बातों को ध्यान में रखकर 20 दिसंबर 1963 को अलग से एक फोर्स का गठन किया गया जिसे नाम मिला- स्पेशल सर्विस ब्यूरो (एसएसबी). इस नए बल में स्थानीय लोगों को प्रमुखता दी गई जिन्हें अरुणाचल के पहाड़ों की जानकारी थी. 2001 में इस संगठन का नाम सशस्त्र सीमा बल कर दिया गया क्योंकि इसकी भूमिका अब पूवरेत्तर राज्यों से अलावा दूसरे राज्यों में भी है. आज की तारीख में एसएसबी की 67 बटालियन हैं जिनमें 76 हजार से ज्यादा जवान हैं. एसएसबी ने बांग्लादेश युद्ध से लेकर करगिल वार तक में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. (कल भालुकपोंग से आगे बढ़ेंगे अरुणाचल की दुर्गम पहाड़ियों में)

Wednesday, August 10, 2016

क्योटो नहीं बनना चाहता वाराणसी



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब घोषणा की कि वाराणसी को क्योटो बना देंगे तो पहली नजर में किसी को समझ ही नहीं आया कि वे करेंगे क्या? फिर धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि ये क्योटो है क्या! इस यात्र के दौरान मैंने दर्जनों लोगों से जानना चाहा कि वे इस मामले में क्या राय रखते हैं. सब यही कहते हैं कि वाराणसी को वाराणसी ही रहने दीजिए इसे क्योटो बनाने की कोई जरूरत नहीं है.
गोदौलिया चौराहे के पास बेहतरीन बनारसी पान लोगों को पेश करने वाले रामश्रवण कहते हैं कि क्योटो हमारे सामने लगता कहां है. वाराणसी तो दुनिया को राह दिखाता रहा है. यहां बाबा विश्वनाथ हैं जो जगत के मालिक हैं. क्योटो के पास क्या है? मैं उन्हें बताता हूं कि जापान का क्योटो शहर सांस्कृतिक शहर है. वहां प्रति वर्ग किलो मीटर 5200 लोग रहते हैं फिर भी बहुत साफ सुधरा है. वाराणसी में आबदी केवल 2400 लोग प्रति वर्ग किलो मीटर है फिर भी हालात बुरे हैं. रामश्रवण मुङो समझाते हैं कि वाराणसी अपनी धुन में बसने वाला शहर है. इसे क्योटो बनाने की कोशिश करेंगे तो सबकुछ बिगड़ जाएगा. वे मोदी की इस बात से बिल्कुल ही प्रभावित नहीं हैं कि जापान का क्योटा शहर हेरिटेज सिटी है. जहां 2000 मठ और मंदिर हैं. जिस तरह से दूसरे विश्व युद्ध के बाद लंदन का नवनिर्माण हुआ या 2001 के भूकंप के बाद गुजरात के भुज का नवनिर्माण हुआ, उसी तरह का नवनिर्माण बनारस का भी होगा.
जहां तक सरकारी स्तर पर वाराणसी को क्योटो बनाने की पहल का सवाल है तो एक दल वाराणसी से वहां गया है और एक दल वहां से यहां आया है. जापान ने यह आश्वासन जरूर दिया है कि वाराणसी के 1400 हेरिटेज बिल्डिंग को सहेजने में तकनीकी सहयोग वह करेगा.
वाराणसी का मिजाज अलग है
बीएचयू के एक छात्र राधेरमण सिंह मुङो अस्सी घाट पर मिल गए हैं और मैंने क्योटो वाला सवाल उनसे भी पूछा है. वे कह रहे हैं कि बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाए यह जरूरी है कि पहले वाराणसी की तासीर को समझा जाए. वे बताते हैं कि वाराणसी शहर का मिजाज क्योटो से कहां मेल खाता है कि इसे क्योटो बना दिया जाए. क्योटो की संस्कृति अलग है, वाराणसी को आप कैसे क्योटो बना देंगे? यहां लाखों लोग घाट पर आते हैं. घाट किनारे जाने वाली सड़क पर करोड़ों का व्यापार फुयपाथ पर होता है. क्या आप फुटपाथ की दुकानें हटा देंगे? क्या आप 70 हजार से अधिक रिक्शा हटा देंगे? वाराणसी काक्योटो बनना संभव ही नहीं है.

आंकड़ बड़े बड़े
राजेंद्र घाट पर बैठे संत हरवंश तो बह़े बड़े आंकड़ों पर ही सवाल खड़ाकरते हैं. वे कहते हैं कि नमामी गंगा प्रोजेक्ट के लिए 6300 करोड़ रुपए की घोषणा हुई थी. इसमें से करीब 2000 करोड़ रुपए गंगा की साफ सफाई पर खर्च होना है. 4200 करोड़ नेविगेशन कॉरिडोर पर और करीब 100 करोड़ रुपए घाटों पर खर्च होना है. बहुत अच्छी बात है लेकिन काम कहीं दिखाई भी तो देना चाहिए. मोदी जी पर भरोसा किया है वाराणसी ने. उन्हें तेजी दिखानी चाहिए. वे भी क्योटो के विरोधी हैं. कह रहे हैं कि क्योटो और वाराणसी के बीच सिस्टर सिटी का समझौता हुआ है लेकिन दोनों शहर बहनें हो ही नहीं सकतीं. एक दूसरे को दोनों शहर जानते समझते ही नहीं हैं.

कहां काशी कहां क्योटो
यहां वाराणसी में कोई भी क्योटो के महत्व को मानने को तैयार नहीं है. जरा उनके तर्क सुनिए..!
1. काशी यानि वाराणसी पांच हजार साल से ज्यादा पुराना शहर है. क्योटो के पास क्या इतनी पुरानी सांस्कृतिक समृद्धि है?
2. वाराणसी के पास गंगा है, क्या क्योटो के पास है?
3. यहां गऊ माता सड़कों पर हमारे साथ घूमती हैं. क्योटो वाले घूमने देंगे क्या?
4. हमारे पास बनारसी पान है, हम कहीं भी पिच कर देते हैं. क्योटो में यह सुविधा नहीं होगी.
5. हमारे यहां 110 तरह की लस्सी बनती है. ब्लू लस्सी पीने क्योटो वाले भी यहीं आते हैं.
6. भांग के साथ मलाई पुष्टि लाजवाब पेय है, क्योटो में नहीं ही मिलता होगा.
7. हमरे यहां मणिकर्णिका घाट है जहां सैकड़ों साल से चिता की आग ठंडी नहीं हुई. क्योटो में ऐसा है क्या?
8. हमारी गलियां हमारी पहचान है. गलियों में जीवन बसता है. क्योटो के पास क्या ऐसी गलियां हैं.
9. काशी में मरने से मोक्ष मिलता है, क्योटो में मरने से क्या मिलेगा.
10. क्योटो बनाने के लिए वाराणसी की गलियों को चौड़ा कर देंगे तो बनारसी संस्कृति बचेगी कहां?

वरुणा और अस्सी को
जीवन मिलना मुश्किल
वाराणसी नाम के पीछे दो नदियों का नाम शामिल है. एक है वरुणा और दूसरी है अस्सी. वरुणा का स्वरप बड़े नाले जैसा बचा है तो अस्सी का स्वरूप इतना बिगड़ चुका है कि उसे ढूंढना भी मुश्कि होता है. बीएचयू जाते हुए मुङो एक नाला दिखाई दिया. मैंने रुक कर इस नाले के बारे में पूछा तो पता चला कि यह तो अस्सी है. इस नाले पर पूरी तरह अतिक्रमण है. मोदी विजन में अभी तक ये दोनों नदियां शामिल नहीं हुई हैं. दोनों ही नाले जाकर गंगा में मिल रहे हैं.

चाय अैर पप्पू दोनों ही निराले!
लीजिए आज की शाम हम आ पहुंचे हैं वराणसी के फेमस पप्पू की चाय दुकान पर. पहुंचते ही ऐसा लग रहा है कि जैसे बगल में कुछ विवाद हो रहा है. एक सज्जन पूरे ताव में हैं और करीब-करीब चिल्लाने की हालत में हैं. ध्यान देते ही पता चल जाता है कि वे मोदी, अखिलेश और वाराणसी के मसले पर दूसरे व्यक्ति के विचारों से गरम हो गए हैं. मैं पप्पू को तलाश रहा हूं. एक पप्पू दुकान पर बैठा है. मैं उससे पूछता हूं कि आप ही पप्पू हैं तो वह हां में सिर हिला देता है और साथ ही यह भी कहता है कि मेरे पिताजी से मिलिए. उसके पिताजी का नाम है विश्वनाथ सिंह. आप उन्हें सिनियर पप्पू कह सकते हैं. मोदी के चुनाव के पहले तक दुकान पर बैठते थे लेकिन अब नेताजी टाइप हाो गए हैं. मोदी की माला जपना शुरु करते हैं. बताते हैं कि मोदी से अभी तक आमने सामने मुलाकात नहीं हुई है लेकिन चाय पर वीहियो चर्चा इसी दुकान से हुई थी.  साथ में चाय की खासियत भी बताते जा रहे हैं कि बिल्कुल ताजा चाय बनाते हैं. कहानी भी सुना रहे हैं कि उनके पिताजी बलदेव सिंह ने कैसे इस चाय की दुकान को संस्कृति का केंद्र बनाया. इस बीच बगल में आवाज तेज हो गई है. बिल्कुल झगड़े जैसी! मैं उधर देखता हूं तो विश्वनाथ सिंह कहते हैं कि पढ़े लिखे लोग हैं, इनका काम ही है बहस करना. अब तो पुराने लोग रहे नहीं. पहले जैसी बहस भी कहां होती है. वे इतिहास के पन्नों में उलझ जाते हैं. बहुत सारे नाम ले रहे हैं. मैं चाय की चुस्की लेता हूं. वाकई बेमिसाल चाय है. पप्पू को नमस्कार करता हूं और अस्सी घाट की ओर बढ़ जाता हूं.



घाटों की तो मानों तकदीर बदल गई है!

वाराणसी, 23 मई।
कोई वारणसी आए और घाटों पर न जाए यह हो ही नहीं सकता! इन घाटों से मेरी पुरानी पहचान है लेकिन इस बार मैं यह देखने और आप तक यह जानकारी पहुंचाने आया हूं कि यहां की तस्वीर कितनी बदली है? यह प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है और उन्होंने घाटों की सफाई का संकल्प लिया हुआ है. बनारस लाइव का पहला सफर शुरु करते हैं इन घाटों के किनारे..!
मैं इस  वक्त दशाश्वमेघ घाट पर हूं. यह घाट वाराणसी के सबसे प्रमुख घाटों में से एक है और सबसे ज्यादा भीड़ भाड़ यहीं रहती है. पर्व त्यौहार के दिनों में यहां 2 लाख से ज्यादा लोग हर रोज स्नान करते हैं. इसलिए इसकी साफ-सफाई सबसे कठिन काम है. करीब दो साल पहले जब मैं यहां आया था तो इस घाट पर नहाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई थी. तब घाट के ठीक नीचे कचरा तैर रहा था. स्नान के लिए मुङो नाव लेकर गंगा के दूसरे किनारे पर जाना पड़ा था लेकिन इस साल मैंने अभी-अभी इसी घाट पर स्नान किया है. यह है बनारस के इस घाट की बदलती हुई तस्वीर! इसे हम चमत्कार भले ही न कहें लेकिन उम्मीद की किरण तो दिखाई जरूर देने लगी है. दशाश्वमेघ घाट पर पहुंचने वाले रास्ते भी बिल्कुल साफ सुथरे नजर आने लगे हैं. गोदौलिया चौक पर ठंडाई की दुकान चलाने वाले राजू केसरी ने मुझसे कहा है कि मोदी ने घाट किनारे सफाई का कमा तो दिखा दिया है.

वाराणसी में प्रमुख रूप से अस्सी घाट हैं. पहला है आदिनाथ घाट और अंतिम है अस्सी घाट. चलिए अब अस्सी घाट की ओर जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सफाई की शुरुआत की थी. नाव से यह सफर करीब एक घंटे का है. दरभंगा घाट, राना महल घाट, राजा घाट और भी बहुत सारे घाट. सारे घाटों के किनारे लोग नहाते हुए नजर आ रहे हैं. पिछली बार जब मैं आया था तब इन घाटों पर गंदगी इतनी थी कि नहाने की कोई हिम्मत ही नहीं कर सकता था. अब पानी मे गंदगी दिखाई नहीं दे रही है. मेरा नाव वाला रमेश शंकर कह रहा है कि पानी साफ है तो कोई अब गंदगी फेंकता भी नहीं है. यहां आने वालो का रवैया बदला हुआ है. हर कोई वारणसी के घाटों को स्वच्छ देखना चाहता है. गंगा को साफ देखना चाहता है. साफ सफाई देखकर वाकई दिल खुश हो रहा है और दिल चाह रहा है कि गंगा का पानी भी निर्मल हो जाए. तभी मेरी नजर जाती है राजा घाट के पास ड्रेनेज की एक मोटी पाइप पर जिसमें से थोड़ा ही सही लेकिन ड्रेनेज का पानी आ रहा है. वहीं एक व्यक्ति शौच भी कर रहा था. मेरे नाव वाले ने कहा कि इनका समझावें मोदी अईहें का?



काशी का अस्सी!
अब हम आ पहुंचे हैं अस्सी घाट . यह लेखकों, कवियों, कलाकारों और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के विद्वानों का पसंदीदा घाट है. कला और संस्कृति का यहां जमघट होता है इसीलिए नरेंद्र मोदी ने सफाई की शुरुआत यहीं से की. दशश्वमेघ घाट की तुलना में यहां भीड़ कम है. सफेद दुधिया रोशनी से पूरा घाट नहाया हुआ है. अस्सी घाट पर औसतन 300 लोग प्रति घंटे आते हैं. पर्व त्यौहारों के अवसर पर यह संख्या 2500 प्रति घंटे तक पहुंच जाती है. यहां एक साथ 22500 लोग जमा हो सकते हैं. मैं  यहां विदेशी पर्यटकों की भीड़ देख रहा हूं. तभी मेरी नजर जाती है वहं पास मे खुदाई कर रही मशीनों पर. मशीन दूसरे घाट पर है लेकिन वह भी अस्सी का ही हिस्सा है. पता चलता है कि यहां दिन और रात काम चल रहा है. यहां 26 मई को मोदी सरकार की सालगिरह पर कार्यक्रम होने वाला है.
मैं अभी उस पप्पू चायवाले की दुकान पर जाना चाहता हूं जो नरेंद्र मोदी के चुनाव में उनके नामांकन का एक प्रस्तावक था. पप्पू की दुकान खानदानी है और दुकान की उम्र 100 साल से उपर हो चुकी है. इसी घाट के नाम पर प्रसिद्ध लेखक काशिनाथ सिंह ने ‘काशी का अस्सी’ नॉवेल भी लिखा है. फिलहाल वक्त इजाजत नहीं दे रहा है. रिपोर्ट  फाइल करनी है. चलिए लौटते हैं. पप्पू की चाय इसी यात्र में किसी दिन पीएंगे.
लौटते हुए मुङो हिंदी साहित्यकार केदारनाथ सिंह की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं. वाराणसी के बारे में बहुत सटीक लिखा है..
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है.
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है

इस धीमी चाल वाले शहर में कम से कम घाटाों पर तो विकास की रफ्तार धीरे नहीं है. शहर भी घूमेंगे और देखेंगे कि वहां तस्वीार कितनी बदली है?


अब मोटरबोट पर लाशें
वाराणसी के घाट वाले इलाके की बड़ी समस्या रही है शव यात्रएं. हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि जिसकी मौत काशी में होती है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है. यही कारण है कि बड़े बुजूर्ग मोक्ष की चाहत में यहां खिंचे चले आते हैं. वे घाट किनारे की धर्मशालाओं में जिंदगी की अंतिम घड़ी का इंतजार करते हैं. जाहिर है कि वाराणसी में दिवंगत होने वालों की संख्या ज्यादा होगी ही. पहले मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट की ओर जाने वाली सड़क पर दिन भर शव यात्रएं निकलती रहती थीं. दुकानदार से लेकर सड़क पर चलने वाले तक परेशान होते थे. ट्रेफिक जाम होता रहता था. अब हालात बदल गए हैं. अब शव या तो मोटरबोट से ले जाए जाते हैं या फिर शव वाहन से. 5 शव वाहनों की व्यवस्था की गई है.  इसके लिए नव गठित संस्था‘मुक्ति मित्र’ काम कर रही है. गुजरात के उद्योगपति सुधांशु मेहता ने यह संस्था खड़ी की है.

नहाने से तलाक!
नारद घाट से गुजरते हुए मुङो इस घाट के बारे में फैेले एक वहम की याद आ गई पर अमूमन पति पत्नी कभी स्नान नहीं करते. इसका कारण एक बहुत बड़ा वहम है. वहम यह है कि यदि पति पत्नी नारद घाट पर स्नान कर लें तो उनका तलाक हो जाता है! गजब का वहम है यह! हां, कुंवारे लोग यहां स्नान जरूर करते हैं.