Monday, September 29, 2014
ग्रीस से सबक सीखने की जरूरत
ग्रीस बहुत बड़ा देश नहीं है. भारत की तुलना में तो शायद कुछ भी नहीं लेकिन वहां आर्थिक मोर्चे पर पिछले तीन-चार साल में जो भी उतार-चढ़ाव आया है वह किसी सुनामी से कम नहीं है. ग्रीस की घटना ने पूरी दुनिया को चौंकाया है और लगे हाथ सतर्क-सावधान भी किया है. पूरे यूरोझोन में ग्रीस की अर्थव्यवस्था को 2007 तक काफी सुदृढ़ माना जाता रहा. उसकी आर्थिक विकास दर काफी तेज थी और विदेशी पूंजी का प्रवाह की तो पूछिए ही मत! लेकिन 2009 के अंत में ग्रीस की अर्थव्यवस्था को जैसे ग्रहण लगना शुरु हो गया. ग्रहण इतनी तेजी से लगा कि दुनिया स्तब्ध रह गई. ग्रीस की हालत ऐसी हो गई कि वह कर्ज में डूबने लगा, कर्ज के चुकारे के लिए कर्ज लेने लगा. अंतत: हालात ऐसे हो गए कि ग्रीस दिवालिया होने की कगारा पर आ गया. यदि यूरो झोन के दूसरे देश आगे न आए होते तो ग्रीस डूब ही गया होता.
खैर, महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रीस की यह हालत हुई कैसे? कोई देश खुशहाली की डगर छोड़कर कर्ज के दलदल में कैसे फंसने लगा और भारत को इससे क्या सीखने की जरूरत है? हम एक दशक पीछे लौटें और ग्रीस पर नजर डालें तो वहां की सरकार जनता के बीच लोकप्रिय होने के लिए कुछ भी करने पर उतारू थी. चूंकि आर्थिक विकास दर काफी तेज थी इसलिए ग्रीस की सरकार को किसी संकट की आशंका भी नहीं थी. लिहाजा कई ऐसे प्रकल्प शुरु किए गए जो जनता की वाहवाही तो लूट रहे थे लेकिन उससे ज्यादा राजकीय कोष को क्षति पहुंचा रहे थे. आश्चर्यजनक रूप से सकल घरेलू उत्पाद कम होता जा रहा था और राजकीय घाटा बढ़ता जा रहा था. तीन साल पहले सकल घरेलु उत्पाद की तुलना में ग्रीस का घाटा 13.6 प्रतिशत तक जा पहुंंचा. ग्रीस की सरकार सांसत में थी. करें तो क्या करें? रास्ता केवल एक था, राजकीय कोष का घाटा कम करना. इसके लिए जरूरी थे कठोर कदम. सरकार ने कोशिश की लेकिन जनता ने नकार दिया. सड़कों पर प्रदर्शन होने लगे. बेहतरीन जीवनशैली की अभ्यस्त हो चुकी जनता को सरकार के कठोर कदम स्वीकार नहीं थे. सरकार ने हाथ फिर पीछे खींच लिए. स्थिति और खराब हो गई. अंतत: कठोर कदम अवश्यंभावी हो गया. ग्रीस का आथा कर्ज माफ हो गया है लेकिनअभी कहना मुश्किल है कि इस संकट से वह कब उबरेगा. आयरलैंड, इटली, स्पेन और पुर्तगाल के हालात भी ठीक नहीं हैं.
अब जरा इस बात पर गौर करें कि भारत को इस घटना से क्या सीखने की जरूरत है. दरअसल हमारे यहां भी लोकप्रिय कदम उठाने की होड़ सी लगी रहती है. खासतौर पर चुनाव के ठीक पहले ऐसी घोषणाएं की जाती हैं और ऐसी योजनाएं शुरु की जाती हैं जो लोकप्रिय तो होती हैं लेकिन उसका असर सीधे देश के राजकीय कोष पर पड़ता है. घोषणा करने वाले नेता कभी इस बात की जरूरत भी नहीं समझते कि एक बार अर्थशास्त्रियों से यह पूछ लें कि इसका असर क्या होगा? ऐसी योजनाएं राजकीय कोष को क्षति पहुंचाती हैं. हम हालांकि आज ठीक ठाक स्थिति में हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्वकाल में हमें अपनी माली हालत ठीक रखने के लिए देश का सोना गिरवी रखना पड़ा था. हमारा देश बड़ा है इसलिए घाटा भी बड़ा हो सकता है और उत्पन्न होने वाली परिस्थितियां ज्यादा विकराल हो सकती हैं. जिस तरह से भारत को दुनिया ने बाजार मान लिया है और बैंकों ने अपनी थैली के मुंह खोल रखे हैं, उससे कई बार गहरे संकट का एहसास होता है. जिस तरह से देश में महंगाई बढ़ रही है और आम आदमी संकट से जूझ रहा है, वह खतरनाक संकेत दे रहा है.
हमें इस बात पर सख्त नजर रखनी होगी कि उपभोक्तावाद को इतना बढ़ावा न मिल जाए कि बाजार ही सरकार को प्रभावित करने लगे. चाणक्य ने कहा था कि प्रशासन के लिए लोकप्रियता तो जरूरी है ही, कठोर अनुशासन भी अत्यावश्यक है. दुर्भाग्य से शासकीय तौर पर वह आर्थिक अनुशासन दिखाई नहीं दे रहा है. कई बार लगता है कि हम बाजार के हाथों में खेल रहे हैं. बाजार केवल पूंजी की बात करता है, मुनाफे की बात करता है. बाजार का मुख्य ध्येय ही होता है लोगों की जेब से पैसा निकालना, ऐसे हालात पैदा कर देना कि लोग कर्ज लेकर खरीददारी करें. इस समय हिंदुस्तान का हर आदमी कर्ज में डूबा हुआ है. जो कर्ज में सीधे नहीं डूबा है, इसका मतलब है कि बाजार उसे कर्ज देने लायक नहीं समझता. जरा सोचिए कि जिस देश का हर आदमी किसी न किसी तरह के कर्ज में डूबा हो, उस देश की मंगलकामना किन शब्दों में की जाए? हमारी सरकार को इस विषय पर सोचना चाहिए. आम आदमी की सुविधा के लिए कर्ज जरूरी हो सकता है लेकिन इतना भी नहीं कि वह बेजरूरत खर्च करने लगे. दुर्भाग्य से हिंदुस्तान का मध्यमवर्ग इसी कुचक्र में फंस गया है. इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता फिलहाल तो नजर नहीं आ रहा है. एक मात्र रास्ता यही है कि सरकारें कठोर कदम उठाएं. बाजार के लाभ का खयाल किए बगैर ऐसे कदम उठाएं जो जनता के हित में हो. हो सकता है कि ऐसे निर्णय लोकप्रिय न हों और विरोधी पक्ष सवाल भी ऊठाए लेकिन सरकार की नजर में केवल देश होना चाहिए.
मैं जिक्र करना चाहूंगा आइसलैंड का जिसने वर्ष 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में गंभीर झटके ङोले. उस वक्त आइसलैंड का पूरा अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम चौपट हो गया था. लेकिन इस बार वह बचा रहा क्योंकि विदेशी बैंकों से वहां के नागरिकों ने किनारा करने का निर्णय ले लिया था. आइसलैंड अत्यंत छोटा देश है इसलिए वहां जागरुकता पैदा करना आसान था लेकिन भारत में यह जरा कठिन काम है. जनता को जागृत किया जाना चाहिए कि कर्ज के कुचक्र में फंसना संकट को न्यौता देना है.
एक बात और! ग्रीस के इस संकट को कुछ लोग पूंजीवाद की असफलता के रूप में भी देख रहे हैं. क्या वाकई ऐसा है? फिलहाल ऐसे किसी निश्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. ग्रीस का संकट वहां की सरकार की असफलता के रूप में देखा जाना चाहिए. वैश्विक आर्थिक संकट के दौर से आखिर पूरी दुनिया के पूंजीवादी देश बाहर निकले ही हैं, अपनी स्थिति को भी उन्होंने सुधारा ही है. जिस तरह से सोवियत रूस के विघटन और चीन की बदलती चाल को साम्यवाद के खात्मे के रूप में नहीं देखा जा सकता, उसी तरह ग्रीस की विफलता को लेकर पूंजीवाद के खात्मे पर मोहर नहीं लगाई जा सकती. महत्वपूर्ण मसला बाजार पर शासकीय और प्रशासकीय नीतियों के नियंत्रण का है. और बहुत कुछ अपनी लोभवादी प्रवृति पर अंकुश का भी!
खैर, महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रीस की यह हालत हुई कैसे? कोई देश खुशहाली की डगर छोड़कर कर्ज के दलदल में कैसे फंसने लगा और भारत को इससे क्या सीखने की जरूरत है? हम एक दशक पीछे लौटें और ग्रीस पर नजर डालें तो वहां की सरकार जनता के बीच लोकप्रिय होने के लिए कुछ भी करने पर उतारू थी. चूंकि आर्थिक विकास दर काफी तेज थी इसलिए ग्रीस की सरकार को किसी संकट की आशंका भी नहीं थी. लिहाजा कई ऐसे प्रकल्प शुरु किए गए जो जनता की वाहवाही तो लूट रहे थे लेकिन उससे ज्यादा राजकीय कोष को क्षति पहुंचा रहे थे. आश्चर्यजनक रूप से सकल घरेलू उत्पाद कम होता जा रहा था और राजकीय घाटा बढ़ता जा रहा था. तीन साल पहले सकल घरेलु उत्पाद की तुलना में ग्रीस का घाटा 13.6 प्रतिशत तक जा पहुंंचा. ग्रीस की सरकार सांसत में थी. करें तो क्या करें? रास्ता केवल एक था, राजकीय कोष का घाटा कम करना. इसके लिए जरूरी थे कठोर कदम. सरकार ने कोशिश की लेकिन जनता ने नकार दिया. सड़कों पर प्रदर्शन होने लगे. बेहतरीन जीवनशैली की अभ्यस्त हो चुकी जनता को सरकार के कठोर कदम स्वीकार नहीं थे. सरकार ने हाथ फिर पीछे खींच लिए. स्थिति और खराब हो गई. अंतत: कठोर कदम अवश्यंभावी हो गया. ग्रीस का आथा कर्ज माफ हो गया है लेकिनअभी कहना मुश्किल है कि इस संकट से वह कब उबरेगा. आयरलैंड, इटली, स्पेन और पुर्तगाल के हालात भी ठीक नहीं हैं.
अब जरा इस बात पर गौर करें कि भारत को इस घटना से क्या सीखने की जरूरत है. दरअसल हमारे यहां भी लोकप्रिय कदम उठाने की होड़ सी लगी रहती है. खासतौर पर चुनाव के ठीक पहले ऐसी घोषणाएं की जाती हैं और ऐसी योजनाएं शुरु की जाती हैं जो लोकप्रिय तो होती हैं लेकिन उसका असर सीधे देश के राजकीय कोष पर पड़ता है. घोषणा करने वाले नेता कभी इस बात की जरूरत भी नहीं समझते कि एक बार अर्थशास्त्रियों से यह पूछ लें कि इसका असर क्या होगा? ऐसी योजनाएं राजकीय कोष को क्षति पहुंचाती हैं. हम हालांकि आज ठीक ठाक स्थिति में हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्वकाल में हमें अपनी माली हालत ठीक रखने के लिए देश का सोना गिरवी रखना पड़ा था. हमारा देश बड़ा है इसलिए घाटा भी बड़ा हो सकता है और उत्पन्न होने वाली परिस्थितियां ज्यादा विकराल हो सकती हैं. जिस तरह से भारत को दुनिया ने बाजार मान लिया है और बैंकों ने अपनी थैली के मुंह खोल रखे हैं, उससे कई बार गहरे संकट का एहसास होता है. जिस तरह से देश में महंगाई बढ़ रही है और आम आदमी संकट से जूझ रहा है, वह खतरनाक संकेत दे रहा है.
हमें इस बात पर सख्त नजर रखनी होगी कि उपभोक्तावाद को इतना बढ़ावा न मिल जाए कि बाजार ही सरकार को प्रभावित करने लगे. चाणक्य ने कहा था कि प्रशासन के लिए लोकप्रियता तो जरूरी है ही, कठोर अनुशासन भी अत्यावश्यक है. दुर्भाग्य से शासकीय तौर पर वह आर्थिक अनुशासन दिखाई नहीं दे रहा है. कई बार लगता है कि हम बाजार के हाथों में खेल रहे हैं. बाजार केवल पूंजी की बात करता है, मुनाफे की बात करता है. बाजार का मुख्य ध्येय ही होता है लोगों की जेब से पैसा निकालना, ऐसे हालात पैदा कर देना कि लोग कर्ज लेकर खरीददारी करें. इस समय हिंदुस्तान का हर आदमी कर्ज में डूबा हुआ है. जो कर्ज में सीधे नहीं डूबा है, इसका मतलब है कि बाजार उसे कर्ज देने लायक नहीं समझता. जरा सोचिए कि जिस देश का हर आदमी किसी न किसी तरह के कर्ज में डूबा हो, उस देश की मंगलकामना किन शब्दों में की जाए? हमारी सरकार को इस विषय पर सोचना चाहिए. आम आदमी की सुविधा के लिए कर्ज जरूरी हो सकता है लेकिन इतना भी नहीं कि वह बेजरूरत खर्च करने लगे. दुर्भाग्य से हिंदुस्तान का मध्यमवर्ग इसी कुचक्र में फंस गया है. इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता फिलहाल तो नजर नहीं आ रहा है. एक मात्र रास्ता यही है कि सरकारें कठोर कदम उठाएं. बाजार के लाभ का खयाल किए बगैर ऐसे कदम उठाएं जो जनता के हित में हो. हो सकता है कि ऐसे निर्णय लोकप्रिय न हों और विरोधी पक्ष सवाल भी ऊठाए लेकिन सरकार की नजर में केवल देश होना चाहिए.
मैं जिक्र करना चाहूंगा आइसलैंड का जिसने वर्ष 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में गंभीर झटके ङोले. उस वक्त आइसलैंड का पूरा अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम चौपट हो गया था. लेकिन इस बार वह बचा रहा क्योंकि विदेशी बैंकों से वहां के नागरिकों ने किनारा करने का निर्णय ले लिया था. आइसलैंड अत्यंत छोटा देश है इसलिए वहां जागरुकता पैदा करना आसान था लेकिन भारत में यह जरा कठिन काम है. जनता को जागृत किया जाना चाहिए कि कर्ज के कुचक्र में फंसना संकट को न्यौता देना है.
एक बात और! ग्रीस के इस संकट को कुछ लोग पूंजीवाद की असफलता के रूप में भी देख रहे हैं. क्या वाकई ऐसा है? फिलहाल ऐसे किसी निश्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. ग्रीस का संकट वहां की सरकार की असफलता के रूप में देखा जाना चाहिए. वैश्विक आर्थिक संकट के दौर से आखिर पूरी दुनिया के पूंजीवादी देश बाहर निकले ही हैं, अपनी स्थिति को भी उन्होंने सुधारा ही है. जिस तरह से सोवियत रूस के विघटन और चीन की बदलती चाल को साम्यवाद के खात्मे के रूप में नहीं देखा जा सकता, उसी तरह ग्रीस की विफलता को लेकर पूंजीवाद के खात्मे पर मोहर नहीं लगाई जा सकती. महत्वपूर्ण मसला बाजार पर शासकीय और प्रशासकीय नीतियों के नियंत्रण का है. और बहुत कुछ अपनी लोभवादी प्रवृति पर अंकुश का भी!
आलू खाते हैं लेकिन पौधा पहचानते नहीं
मेरे एक युवा मित्र अभी-अभी हैदराबाद से लौटे हैं. अपनी एक पुरानी मित्र से मिलने गए थे जो बचपन में उनके साथ पढ़ती थी, कस्बे के उसी स्कूल में जहां वे खुद पढ़े हैं. बहुत ही अभिभूत हैं उससे. उसकी तारीफ के कसीदे काढ़ रहे थे- ‘क्या अंग्रेजी बोलती है बॉस! तीन दिनों में हिंदी का तो एक शब्द भी उसके मुंह से नहीं सुना. मेरे मुंह से ‘अभिप्राय’ शब्द सुनकर तो वो बिल्कुल चौंक गई. कहने लगी योर हिंदी वोकेबलरी इज टू गुड! बॉस, मैं तो उसकी अंग्रेजी पर लोटपोट हो रहा था. उसका बच्च भी अंग्रेजी में ही बात करता है. ऐसी अंग्रेजी बोलता है जैसे अंग्रेज का बच्च बोल रहा हो. अपन लोग तो वैसी अंग्रेजी बोल ही नहीं पाते! बच्चे के पास भी लैपटॉप है. खाना नौकरानी बनाती है, वही बच्चे की देखभाल भी करती है. बहुत ही व्यस्त है मेरी दोस्त. एक मल्टीनेशनल कंपनी की अधिकारी है और कई बार ड्यूटी से रात को दो बजे घर लौटती है. क्या शानदार जिंदगी है बॉस! बिल्कुल लज्जतदार जिंदगी! बहुत आगे निकल गई वो, अपन तो बहुत ही पीछे रह गए!’
मैं युवा मित्र की आंखों की चमक देख रहा था. यह महसूस करने की कोशिश कर रहा था कि आधुनिक जिंदगी की लालसा किस तरह युवाओं को अपनी चपेट में लेती है. यह सोच कर भयभीत हो रहा था कि अंग्रेजी क्या इस तरह वाकई निगल रही है हमारी मातृभाषा को? क्या अंग्रेजी बोलना इतना महत्वपूर्ण है कि हिंदी या क्षेत्रीय बोली बोलने वाला व्यक्ति ग्लानि का अनुभव करने लगे? युवा मित्र तारीफों के पुल बांधे जा रहे थे और मेरे जेहन में कई सवाल खड़े हो रहे थे. मैं अपने आप से पूछ रहा था कि रूस, चीन और जापान के लोग अंग्रेजी की दासता के बगैर तेजी से तरक्की कर रहे हैं तो हम हिंदी वालों को अंग्रेजी के इस भूत ने इस कदर क्यों भयभीत कर दिया है? हिंदुस्तान में यह सोच क्यों विकसित हो गई कि बगैर अंग्रेजी जाने आप इज्जत नहीं पा सकते! यह वही देश है जिसने संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में अटल बिहारी वाजपेयी के हिंदी में भषण देने पर इस कदर तालियां बजाई थीं कि गूंज पूरी दुनिया ने सुनी थी, फिर ऐसा क्या हो गया कि हिंदी पर खुद का सीना फुलाने के बजाए अंग्रेजी के नशे में डूबने लगा यह देश!
बेशक अंग्रेजी मौजूदा दौर की एक महत्वपूर्ण भाषा है और किसी भी भाषा की जानकारी व्यक्ति को वैचारिक तौर पर समृद्ध ही बनाती है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं होना चाहिए कि हम दूसरी भाषा को इतना महान मान बैठें कि खुद की भाषा का ही तिरस्कार करने लगें. सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा कह कर यदि हम खुशी से झूम उठते हैं तो यही भाव अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय बोली को लेकर क्यों महसूस नहीं करते? ..और जो लोग अंग्रेजी बोलते हैं, क्या वे सोचते भी अंग्रेजी नजरिए से ही हैं? बिल्कुल नहीं. हिंदुस्तान में अंग्रेजी बोलने वाले ज्यादातर लोग सोचते हिंदी में हैं और उसे ट्रांसलेट करके बोलते हैं. अंग्रेजी में गिटर-पिटर करने वाले ऐसे ज्यादातर ‘महापुरुष’ न अच्छी अंग्रेजी जानते हैं और न अच्छी हिंदी. भाषायी तौर पर आप उन्हें कंगाल कह सकते हैं. ..तो सवाल यह पैदा होता है कि हम इन भाषायी कांगालों को इतना महान क्यों मान रहे हैं? दरअसल यह हमारी दासता वाली सोच का नतीजा है. दो सौ साल तक अंग्रेजों ने हमें बताया कि तुम हिंदी वाले छोटे लोग हो, इसलिए हम तुम पर राज कर रहे हैं. अंग्रेज चले गए लेकिन हम अंग्रेज बनने की चाहत में पागल हुए जा रहे हैं. हर कोई अपने बच्चे को ऐसे स्कूल में पढ़ाना चाहता है जहां बच्च अंग्रेजी बोलने लगे! यह दुर्भाग्य की बात है कि हम ऐसी पौध तैयार कर रहे हैं जिसे अपनी भाषा और अपनी मिट्टी की जानकारी नहीं है.
अंग्रेजी में गिटर-पिटर करने वाले नमूनों के बच्चों को कुछ पौधे दिखाइए और पूछिए कि यह कौन सा पौधा है तो आंखें बाहर आ जाएंगी लेकिन जवाब नहीं सूङोगा! वे आलू खाते हैं लेकिन आलू का पौधा नहीं पहचान सकते. आखिर ये कौन सी ब्रीड और कैसा ब्रांड तैयार कर रहे हैं हम देश के लिए?
एक और बात..!
अंग्रेजियत की यह सुनामी रिस्तों की हर मिठास को ऐसे समंदर में बहा ले जा रही है जहां का पानी बिल्कुल खारा है. उसमें रिस्तों की मिठास के प्रवाह को ढूंढना नामुमकिन सा है. जिस दोस्त के पारिवारिक स्टेटस और लज्जतदार जिंदगी को देखकर हमारे युवा मित्र अभिभूत हुए जा रहे हैं, उसी परिवार का छोटा बच्च उनसे कह रहा था-‘लेट्स प्ले विद मी, मम्मा नेवर प्ले बिकॉज शी इज टू बिजी.’
उस बच्चे के दर्द को समङिाए..जब मां ही उसके साथ वक्त नहीं बिताती है तो वह जिंदगी के राग और अनुराग क्या सीखेगा..?
मां की हर बात निराली..!
तपती दोपहरी में जैसे शीतल छाया
मां तेरा वो गोद सलोना..!
ममता के आंचल में सुरभित जीवन
मां तेरा वो गोद खिलौना..!
पल्लवित हुए हम तेरी छाया में
मां तू अमृत का प्याला..!
जीवन शक्ति का आधार बना
ममता का हर वो एक निवाला..!
जिस उपवन को सींचा तुमने
वहां छायी हरियाली..!
बगिया का हर पुष्प स्मरण करे तुम्हारा
हाथों में है पूजा की थाली..!
मां जैसा दूजा कोई नहीं दुनिया में
मां की हर बात निराली..!
मां तेरा वो गोद सलोना..!
ममता के आंचल में सुरभित जीवन
मां तेरा वो गोद खिलौना..!
पल्लवित हुए हम तेरी छाया में
मां तू अमृत का प्याला..!
जीवन शक्ति का आधार बना
ममता का हर वो एक निवाला..!
जिस उपवन को सींचा तुमने
वहां छायी हरियाली..!
बगिया का हर पुष्प स्मरण करे तुम्हारा
हाथों में है पूजा की थाली..!
मां जैसा दूजा कोई नहीं दुनिया में
मां की हर बात निराली..!
सब भगवान ही करें! और हम कुछ नहीं?
इन दिनों हम सब शक्तिस्वरूपा मां दुर्गा की आराधना का महापर्व मना रहे हैं. पूजा अर्चना कर रहे हैं. भक्ति के गीत गा रहे हैं. खुशियां मना रहे हैं. स्वयं की शुद्धि के लिए बहुत से लोग उपवास भी कर रहे हैं. हर ओर हर्षोल्लास है. पूरा वातावरण भक्तिभाव में डूबा है. मां अंबे की गूंज हैं. आकांक्षा सबकी यही है कि मां सबका भला करें. जीवन सुखमय हो जाए! ऐसी आकांक्षा हमें करनी चाहिए. सबका भला भी होना चाहिए लेकिन इस वक्त बड़ा सवाल यह है कि क्या सबकुछ भगवान ही करें? हम कुछ न करें? हम अपनी सांस्कृतिक सीख का पालन तक न करें? यह कितना बड़ा विरोधाभाष है कि जो संस्कृति हमें मां को ईश्वर के समकक्ष रखना सिखाती है. जो संस्कृति नारी को सर्वदा पूजयेत कहती है, उसी संस्कृति में पलने-बढ़ने वाले समाज का एक बड़ा हिस्सा नारी का असम्मान करता है. हर धर्म सदाशयता, सद्भाव और समर्पण सिखाती है लेकिन हम इसका कितना पालन करते हैं. हम स्वच्छता की बात करते हैं लेकिन हम अपने अंतर्मन को कितना स्वच्छ और निर्मल बनाते हैं? मां की आराधना के इस पावन पर्व पर कुछ ऐसा संकल्प लीजिए कि अपना भला भी हो और समाज/देश का भी भला हो! पूजा तभी सार्थक होगी!
कवि सुरेंद्र शर्मा मौजूदा हालात पर बड़ी तीखा व्यंग करते हैं. वे कहते हैं-‘माता को हम चौका पर बिठाकर पूजते हैं और अपनी मां चौके में बर्तन मांजने पर मजबूर होती है.’ बात कड़वी है लेकिन है सोलह आने सच! क्या कभी हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि विधवाश्रम में ऐसी कितनी महिलाएं हैं जिनके बेटे और बहू ने उन्हें वहां पहुंचा दिया है? यह जानने में हमारी कोई रुचि नहीं होती. हम अपने आप में मगन रहते हैं. मां का दिल देखिए कि कभी ऐसो बेंटों की पहचना भी उजागर नहीं करती! ध्यान रखिए कि आप जो व्यवहार अपने माता-पिता से कर रहे हैं, आपका बच्च वही व्यवहार आपसे करेगा!
नारी पूजने वाले इस देश में महिलाओं के साथ क्या व्यवहार होता है इसकी थोड़ी बहुत कहानी तो सरकारी आंकड़े कह ही देते हैं. हालांकि स्थिति इससे ज्यादा विकराल है. फिर भी आईए नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2012 के उपलब्ध कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं. महिलाओं के खिलाफ 2 लाख 44 हजार 270 अपराध हुए. इनमें से 1 लाख 6 हजार 527 मामले घरेलू हिंसा के थे. आकड़े बताते हैं कि प्रत्येक 9 मिनट में कोई न कोई महिला घरेलू हिंसा का शिकार होती है. महिलाओं के खिलाफ हर 3 मिनट में एक अपराध होता है. वर्ष 2012 में देश में बलात्कार के 24923 मामले दर्ज किए गए. इनमें से 24470 बलात्कार के मामलों में कोई न कोई परिचित शामिल था. क्या यही है हमारी संस्कृति कि एक तरफ तो नारी को पूजें और दूसरी तरफ उसे प्रताड़ित करें! चलिए, ज्यादातर लोग यह कहेंगे कि वे तो नारी को प्रताड़ित नहीं करते! ऐसे लोगों से एक सवाल पूछा जा सकता है कि अपने पड़ोस में घरेलू हिंसा का शिकार हो रही महिला के पक्ष में कभी उठे हैं वे? ज्यादातर लोग जवाब नहीं देंगे. मौन साध लेंगे. क्या अपराध घटित होते देखना किसी अपराध से कम है?
नारी को पूजने वाले इस देश में दहेज का दाग जितना गहरा है, उतना किसी और देश में नहीं है. कितना शर्मनाक है यह सब! कन्या भ्रुण हत्या का बड़ा कारण संभत: यह दहेज ही है. जिन समाजों में दहेज का बोलबाला है, वहां लड़की का जन्म होते ही परिवार को भय सताने लगता है कि दहेज कहां से जुटाएंगे. इससे बचने के लिए वह परिवार कन्या भ्रुण हत्या पर उतर आता है. कम ही ऐसे परिवार हैं जिन्होंने दहेज को अपने से दूर किया है और बहू को बेटी का सम्मान दिया है. आश्चर्यजनक यह है कि लोग अपनी बेटी के लिए तो सुखी ससुराल की कल्पना करते हैं लेकिन अपनी बहु को सुख देने में कोताही बरत जाते हैं. दहेज के ज्यादातर मामले तो सामने भी नहीं आते! जो मामले सामने आते हैं, वे वही होते हैं जहां सहन की सीमा समाप्त हो जाती है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2012 में दहेज हत्या के 8233 मामले दर्ज हुए. जरा कल्पना कीजिए कि दहेज प्रताड़ना के कितने मामले हुए होंगे. क्या कभी हमने यह जानने समझने की कोशिश की है कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या हमारी पूजा सार्थक है? माता की पूजा वास्तव में तभी सार्थक होगी जब हम नारी का सम्मान करना सीखेंगे.
हम संकल्प लें
माता-पिता का असम्मान करने वालों का सामाजिक बहिष्कार करेंगे.
गुंडागर्दी से नहीं डरेंगे. गुंडों को प्रश्रय देने वाले राजनेताओं का नकार देंगे.
्रअपराध न करेंगे और न करने देंगे
अराजकता न फैलाएंगे, न बर्दाश्त करेंगे.
रिश्वत न देंगे और न लेंगे.
बेईमानी न करेंगे, न करने देंगे.
मिलावट के खिलाफ लड़ेंगे.
गंदगी न फैलाएंगे, न फैलाने देंगे.
भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिए एक जुट होंगे.
बलात्कार करने वालों का सामाजिक बहिष्कार करेंगे.
दहेज मांगने वाले परिवार में शादी नहीं करेंगे.
घोटाले की भनक लगते ही पुलिस को खबर देंगे
कन्यभ्रुण हत्या वाले परिवार का बहिष्कार करेंगे.
बाल मजदूरी को रोकेंगे. यदि सक्षम हैं तो ऐसे बालकों को पढ़ाने की कोशिश करेंगे.
झगडा-फसाद से दूर रहेंगे.
इनका सम्मान करेंगे
सच्चई
ईमानदारी
अनुशासन
नारी सम्मान
एकता
उदारता
सहिष्णुता
सद्भाव
देशभक्ति
अमिताभ से मिलने के बाद
क्या लिखा था डॉ. हेन ने?
प्रसंग बहुत पुराना है लेकिन है बहुत मौंजू! शादी के बाद अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी हनीमून के लिए ब्रिटेन जा रहे थे तो डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने उनसे कहा कि कैंब्रिज जाकर मेरे गुरु और गाइड डॉ. हेन से जरूर मिलना, उनका आशीष लेना. डॉ. हरिवंश राय बच्चन जब पीएचडी के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय में महान कवि डब्ल्यू बी. इट्स पर शोध कर रहे थे तो डॉ. हेन उनके गाइड थे. खैर, अमिताभ और जया उनसे मिले. डॉ. हेन बहुत खुश हुए. इस मिलन के बाद डॉ. हेन ने हरिवंश राय बच्चन को पत्र लिखा कि यह भारत में ही संभव है कि बेटा और बहू माता-पिता के साथ रहे. मेरा बेटा अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन क्या वह होता तो हमारे साथ होता? नहीं होता! क्योंकि हमारे यहां तो बेटा अपनी शादी के साथ ही अलग घर बसा लेता है. बहुत सहृदयता हुई तो छठे चौमासे कभी मिलने आ गया या कभी अपने घर बुला लिया. साथ रहने का तो सवाल ही नहीं है.
जरा सोचिए! क्या हम अपनी संस्कृति छोड़कर कहीं फिरंगियों की संस्कृति तो नहीं अपना रहे हैं?
Saturday, July 7, 2012
इन सड़कों पर पले मोहब्बत
छुप-छुप कर मिलने का अब वो दौर कहां रहा! अब तो जमाना है मोहब्बत के बेइंतहां इजहार का, इश्क के परवान का! इस शहर नागपुर को कहते हैं भारत का दिल, तो भला दिल यहां मोहब्बत के लिए क्यों न धड़के? यहां न खाप की किसी पंचायत का खौफ है और न जमाने की जिल्लत की भय! दौड़ती सड़कों के किनारे छांव आशियाने बन गए हैं, मोहब्बत परवान चढ़ने लगी है. एक मशहूर गाने की पैरोडी गुनगुनाने को जी चाहता है..‘इन सड़कों पर पले मोहब्बत.’
हर शहर में मोहब्बत की अपनी एक अलग कहानी होती है. दिल्ली में लोधी गार्डन है तो मुंबई में बैंड स्टैंड और गुवाहाटी में लवर्स प्वाइंट! अपने शहर में है तेलनेखेड़ी, सेमिनरी और अंबाझारी गार्डन के अलावा फुटाला तालाब! महराजबाग और ऐसे ही कुछ और छोटे-मोटे पनाहगार हैं लेकिन वक्त के साथ आशिकों की संख्या इस तेजी से बढ़ रही है कि मोहब्बत सड़कों पर उतर आई है. सड़कों पर हरियाली की छांव फैली है, इससे मुफीद जगह और कहां मिल सकती है? यहां न कोई रोकने वाला है, न टोकने वाला. बस चेहरा सड़क से दूसरी ओर ही तो करना है!
सड़कों पर मोहब्बत सुकून से पलती है. पुलिस वालों का भय नहीं होता. गार्डन में तो हमेशा यह खौफ ही सताता रहता है कि पता नहीं किस झाड़ी से कोई पुलिसवाला डंडा फटकारता हुआ निकल आएगा और जेब हलकी करने पर मजबूर कर देगा. पता नहीं कौन सा मनचला कोई फब्ती कस देगा. पता नहीं किस कोने से समाज और संस्कृति के स्वंभू कमांडर निकल आएंगे और दो डंडे फटकार देंगे. मशहूर शायर मुनव्वर राना का एक शेर है-
गलियों में वही लड़के, हाथों में वही पत्थर!
क्या लोग मोहब्बत को हर दौर में मारेंगे!!
सड़कों पर सबकुछ खुला-खुला है, इसलिए कोई भय नहीं, लेकिन एक चिंता जरूर सताती रहती है कि इस इलाके से कहीं बापू न निकल आएं. कहीं पहचान न लें! अब ऐसे खतरे तो प्रेमियों को हर जमाने में ङोलने पड़े हैं. लेकिन सड़कें ऐसी ही चुनी जाती हैं जिन पर कभी बापू न जाते हों, घर से जरा दूर हो ताकि किसी पड़ोसी की नजर न पड़े! इन सड़कों का एक फायदा यह भी है कि यहां पार्को की तरह टिकट नहीं लगता और वाहन पार्क करने के लिए भी कोई रकम नहीं चुकानी पड़ती. सड़क किनारे वाहन खड़ा किया और मोहब्बत के पैगाम शुरु ! मोहब्बत को पनाह देने में सिविल लाईन, सेमिनरी हिल्स, तेलंगखेड़ी, अंबाझरी, गांधीसागर, सी.पी. क्लब, पुलिस जिमखाना, वेस्ट हाईकोर्ट रोड, पांढराबोढ़ी, छिंदवाड़ा रोड, काटोल रोड, अमरावती रोड, वीएनआईटी रोड आदि काफी आगे हैं. बस यहां इस बात का ध्यान रखना होता है कि पार्क जैसी नजदीकियां न बढ़ाएं.
ऐसी ही किसी सड़क पर किसी दिन मोहब्बत परवान चढ़ जाती है. फिर ये प्रेमी जोड़े मुनव्वर राना का शेर गुनगुनाते हैं..
पार्को में, न सिनेमा में, न सड़कों पर कहीं!
फैसला कर लो कि अब घर में मिलेंगे हम!!
लेकिन हर मोहब्बत की किस्मत इतनी भाग्यशाली नहीं होती. ज्यादातर मोहब्बत उसी तरह दम तोड़ जाती है जिस तरह बारिश में सड़कें!
अपराध की अंधी गली में दाखिल बचपन
लोग अक्सर कहते हैं कि जीवन को सुखी रखना है तो अपने भीतर बचपन को जिंदा रखो! बहुत सटीक कहावत है यह लेकिन वक्त की हकीकत यह है कि हम उस दर्दनाक दौर से गुजर रहे हैं जहां बच्चों से ही बचपन छीना जा रहा है. अपने भीतर बचपन को जिंदा रखने की बात तो बहुत दूर की है. मंजर वाकई खतरनाक है. बच्चों पर जरा ध्यान दीजिए!
बीते सप्ताह बच्चों से जुड़ी दो ऐसी खबरें आईं जिसने सभी को चौका दिया और यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जिन हाथों में गिल्ली डंडे और क्रिकेट का बल्ला या बॉल होना चाहिए उन हाथों में चाकू कहां से आ गए? ..जिन पैरों को विकास की रफ्तार पकड़नी थी या फुटबॉल की फिरकी घुमानी थी वो जेल की तरफ कैसे रवाना हो गए? इसके साथ ही हर माता-पिता के भीतर एक भय भी समा गया कि कहीं उनका बेटा भी तो ऐसी दुर्गति का शिकार न हो जाए. पहली खबर उत्तर भारत से थी-एक पोते ने अपने दादी की हत्या कर दी. दूसरी खबर महाराष्ट्र के पुणो शहर से थी. तीन दोस्तों ने अय्याशी के लिए धन जुटाने की नीयत से अपने ही एक साथी को मार डाला. मरने वाला भी नाबालिग था और मरने वाले भी नाबालिग!
इस तरह की घटनाएं रह-रह कर देश के किसी न किसी हिस्से से आती रहती है. बल्कि यह कहें कि ऐसी खबरों की रफ्तार तेजी हो रही है अर्थात नाबालिगों के अपराध की दुनिया में पहुंचने की घटनाएं बढ़ रही हैं. सवाल यह पैदा होता है कि बच्चे इस तरह का कदम क्यों उठा रहे हैं. हर घटना को यदि इकाई मानकर उसकी व्याख्या या विवेचना करें तो कुछ तात्कालिक कारण उभरकर सामने आते हैं लेकिन समग्रता के साथ यदि विचार करें तो तस्वीर भयावह नजर आती है. यह कहने में कोई संकोच नहीं कि बच्चों की दुनिया बदल रही है और इसे बदलने में जाने-अनजाने हम माता-पिता ही प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं.
हमारा सामाजिक तानाबाना इतना खंडित और बेवजह इतना जटिल होता जा रहा है बच्चे आत्मकेंद्रित हो रहे हैं. जिन माता पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं है उन बच्चों की जिदंगी में न लोरी रही, न प्रेरणादायी पारंपरिक किस्से और न ही जीवन की घुट्टी कहे जाने वाले दादी अम्मा के नुस्खे! बच्चों की जिंदगी को जकड़ लिया है कॉमिक्स ने, काटरून्स ने, फिल्मों ने और हिंसा पर उतारू टेलिविजन के धारावाहिक किस्सों ने. भौतिक विकास की अंधी दौड़ में बच्चों से बचपन छिन गया है और वे समय से पहले उम्र की सीमाएं लांघ रहे हैं. इसीलिए किसी दिन अखबार के पन्नों पर खबर पढ़ने को मिलती है कि पंद्रह साल के एक किशोर ने एक छोटी बच्ची के साथ बलात्कार कर दिया. हमारे घरों में बैठा काला बक्सा तबाही मचा रहा है, वह बच्चों को उम्र से पहले ही बता देता है कि सुगंधित कंडोम क्या बला है और खास तरह के नैपकिन पहनकर लड़कियां कैसे उछल कूद सकती हैं. जो लोग बच्चों को सेक्स शिक्षा देने की बात कर रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि हमारा टीवी यह काम बखूबी कर रहा है. इंटरनेट का खुला संसार तो बच्चों की जद में है ही. दुनिया की कोई भी बात बच्चों से छिपी नहीं है.
भौतिकता की अंधी आंधी ने जिस तरह से हमारे भीतर अजीब किस्म की ललक पैदा कर दी है उसी तरह भौतिक चाहतों ने बच्चों को भी अपना शिकार बनाया है. हमारी औकात नहीं होती लेकिन किस्तों की कार पर सवार होने में हम कतई परहेज नहीं करते उसी तरह बच्चों के भीतर भी यह चाहत पैदा होती है कि पैसा उनके पास भी हो और वे भी गुलर्छे उड़ाएं. अमने परिवार की आर्थिक हैसियत देखने और उसी के अनुरूप व्यवहार करने का खयाल उनके मन में नहीं आता क्योंकि माता-पिता ने कभी इस दिशा में शिक्षित करने का कोई प्रयास ही नहीं किया. कुछ माता-पिता दैनिक जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और कुछ माता-पिता के लिए उनके बच्चे शैक्षणिक हैसियत के टूल बन गए हैं. फलां का बच्च 97 प्रतिशत अंक लाया है, नालायक तुम्हारे अंक कम क्यों आते हैं? बच्चों के बीच कम और माता-पिता के बीच एक अजीब किस्म की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है. इस प्रतिस्पर्धा का सबसे ज्यादा शिकार बच्चे ही हो रहे हैं. एक भीषण किस्म का तनाव उन्हें घेर रहा है.
जब बच्चे के मन में तनाव होता है तो वह राहत भी चाहता है और राहत का अक्स उसे भौतिकता में नजर आता है. उसे लगता है कि अच्छे होटल में खाना और महंगी गाड़ी में घूमना ही जिंदगी का असली मकसद है. वह फिल्में देखता है और शाहरुख और सलमान खान बन जाना चाहता है. फिल्मी हीरो को जब वह फाइट करते देखता है तो उसमें खुद की तस्वीर तलाशने की कोशिश करता है. यही तस्वीर उसे अपने कंप्यूटर पर भी दिखाई देती है क्योंकि वीडियो गेम का हीरो शानदार तरीके के पिस्टल चलाता है, बम फोड़ता है और जीत हासिल करता है. बच्चे को लगने लगता है कि हथियार में ही शक्ति है, वही उसे कम वक्त में उसकी मनचाही मुराद पूरी करा सकता है. इस तरह हथियारों के प्रति उसकी चाहत बढ़ने लगती है. पैसे के प्रति उसका मोह खतरनाक सुनामी की तरह जीवन को तबाह करने की दिशा में आगे बढ़ जाता है.
दूर करें एकाकीपन
तो सवाल यह है कि क्या किया जाए? वक्त की अंधी रफ्तार से बच्चों को कैसे बचाया जाए. उनकी जिंदगी में उनका बचपन और उकी खिलखिलाहट कैसे वापस लाई जाए? यह सवाल जितना कठिन है, उससे ज्यादा कठिन इसे हमने बना दिया है. इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें केवल तीन दशक पहले लौटना होगा जब बच्चों की दुनिया में इतनी आपाधापी नहीं थी. दरअसल बच्चों को आज की आपाधापी से बचाने की जरूरत है. यह हम कर सकते हैं. इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि बच्चों के जीवन में आए एकाकीपन को दूर करना.
थ्री इडियट का प्रिंसिपल मत बनिए!
अमूमन होता यह है कि माता-पिता खुद ही यह तय कर लेते हैं कि उनके बच्चे को बनना क्या है. फिल्म थ्री इडियट में इंजीनियरिंग कॉलेज का प्रिंसिपल यही तो करता है! नतीजा? भले ही बच्च जान नहीं दे लेकिन उसकी जिंदगी की जान जरूर निकल जाती है. हम में से ज्यादातर लोग अपने बच्चे को आयएएस, डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं. एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं करते कि बच्चे का रुझान क्या है? किस चीज के प्रति उसकी ज्यादा चाहत है. किशोरावस्था तक बच्चे की चाहत समझ में आने लगती है. उस पर दबाव मत डालिए, उसे जो बनना है, बनने दीजिए. उसे केवल इतना बताइए कि जो बनो, बेहतर बनो! आपका दबाव उसे तनावग्रस्त बना सकता है.
कानून का सम्मान करना सिखाइए
बच्चे को यह बताना बहुत जरूरी है कि सही राह उसके जीवन को कैसे खुशहाल बना सकती है. उसे कानून का पालन करना सिखाइए. कानून का सम्मान आपके आचरण में शामिल होगा तो आपका बच्च भी यही सीखेगा. आप ट्रेफिक के नियम तोड़ेंगे तो वह बड़ा होकर आपसे ज्यादा नियम तोड़ेगा. आप भ्रष्ट होंगे तो वह आपसे ज्यादा भ्रष्ट साबित होगा. इसलिए तय आपको ही करना है कि आपका बच्च कैसा बने.
कुछ खास बातों पर ध्यान दें.
- बच्चों से दोस्ताना लेकिन अनुशासनपरक व्यवहार करें
- हम बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताए.
- अपने बच्चे की मन:स्थिति को समझने की कोशिश करें.
- ध्यान रखें कि आपका बच्च क्या करता है, कहां जाता है.
- घर लौटने का समय निर्धारित करें.
- कभी-कभी स्कूल फोन करके बच्चे के व्यवहार के बारे में पूछें
- यह सुनिश्चित करें कि उसकी दोस्ती अच्छे बच्चों के साथ हो.
- बच्चे के दोस्त के परिवार से निकटता बढ़ाएं.
बीते सप्ताह बच्चों से जुड़ी दो ऐसी खबरें आईं जिसने सभी को चौका दिया और यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जिन हाथों में गिल्ली डंडे और क्रिकेट का बल्ला या बॉल होना चाहिए उन हाथों में चाकू कहां से आ गए? ..जिन पैरों को विकास की रफ्तार पकड़नी थी या फुटबॉल की फिरकी घुमानी थी वो जेल की तरफ कैसे रवाना हो गए? इसके साथ ही हर माता-पिता के भीतर एक भय भी समा गया कि कहीं उनका बेटा भी तो ऐसी दुर्गति का शिकार न हो जाए. पहली खबर उत्तर भारत से थी-एक पोते ने अपने दादी की हत्या कर दी. दूसरी खबर महाराष्ट्र के पुणो शहर से थी. तीन दोस्तों ने अय्याशी के लिए धन जुटाने की नीयत से अपने ही एक साथी को मार डाला. मरने वाला भी नाबालिग था और मरने वाले भी नाबालिग!
इस तरह की घटनाएं रह-रह कर देश के किसी न किसी हिस्से से आती रहती है. बल्कि यह कहें कि ऐसी खबरों की रफ्तार तेजी हो रही है अर्थात नाबालिगों के अपराध की दुनिया में पहुंचने की घटनाएं बढ़ रही हैं. सवाल यह पैदा होता है कि बच्चे इस तरह का कदम क्यों उठा रहे हैं. हर घटना को यदि इकाई मानकर उसकी व्याख्या या विवेचना करें तो कुछ तात्कालिक कारण उभरकर सामने आते हैं लेकिन समग्रता के साथ यदि विचार करें तो तस्वीर भयावह नजर आती है. यह कहने में कोई संकोच नहीं कि बच्चों की दुनिया बदल रही है और इसे बदलने में जाने-अनजाने हम माता-पिता ही प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं.
हमारा सामाजिक तानाबाना इतना खंडित और बेवजह इतना जटिल होता जा रहा है बच्चे आत्मकेंद्रित हो रहे हैं. जिन माता पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं है उन बच्चों की जिदंगी में न लोरी रही, न प्रेरणादायी पारंपरिक किस्से और न ही जीवन की घुट्टी कहे जाने वाले दादी अम्मा के नुस्खे! बच्चों की जिंदगी को जकड़ लिया है कॉमिक्स ने, काटरून्स ने, फिल्मों ने और हिंसा पर उतारू टेलिविजन के धारावाहिक किस्सों ने. भौतिक विकास की अंधी दौड़ में बच्चों से बचपन छिन गया है और वे समय से पहले उम्र की सीमाएं लांघ रहे हैं. इसीलिए किसी दिन अखबार के पन्नों पर खबर पढ़ने को मिलती है कि पंद्रह साल के एक किशोर ने एक छोटी बच्ची के साथ बलात्कार कर दिया. हमारे घरों में बैठा काला बक्सा तबाही मचा रहा है, वह बच्चों को उम्र से पहले ही बता देता है कि सुगंधित कंडोम क्या बला है और खास तरह के नैपकिन पहनकर लड़कियां कैसे उछल कूद सकती हैं. जो लोग बच्चों को सेक्स शिक्षा देने की बात कर रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि हमारा टीवी यह काम बखूबी कर रहा है. इंटरनेट का खुला संसार तो बच्चों की जद में है ही. दुनिया की कोई भी बात बच्चों से छिपी नहीं है.
भौतिकता की अंधी आंधी ने जिस तरह से हमारे भीतर अजीब किस्म की ललक पैदा कर दी है उसी तरह भौतिक चाहतों ने बच्चों को भी अपना शिकार बनाया है. हमारी औकात नहीं होती लेकिन किस्तों की कार पर सवार होने में हम कतई परहेज नहीं करते उसी तरह बच्चों के भीतर भी यह चाहत पैदा होती है कि पैसा उनके पास भी हो और वे भी गुलर्छे उड़ाएं. अमने परिवार की आर्थिक हैसियत देखने और उसी के अनुरूप व्यवहार करने का खयाल उनके मन में नहीं आता क्योंकि माता-पिता ने कभी इस दिशा में शिक्षित करने का कोई प्रयास ही नहीं किया. कुछ माता-पिता दैनिक जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और कुछ माता-पिता के लिए उनके बच्चे शैक्षणिक हैसियत के टूल बन गए हैं. फलां का बच्च 97 प्रतिशत अंक लाया है, नालायक तुम्हारे अंक कम क्यों आते हैं? बच्चों के बीच कम और माता-पिता के बीच एक अजीब किस्म की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है. इस प्रतिस्पर्धा का सबसे ज्यादा शिकार बच्चे ही हो रहे हैं. एक भीषण किस्म का तनाव उन्हें घेर रहा है.
जब बच्चे के मन में तनाव होता है तो वह राहत भी चाहता है और राहत का अक्स उसे भौतिकता में नजर आता है. उसे लगता है कि अच्छे होटल में खाना और महंगी गाड़ी में घूमना ही जिंदगी का असली मकसद है. वह फिल्में देखता है और शाहरुख और सलमान खान बन जाना चाहता है. फिल्मी हीरो को जब वह फाइट करते देखता है तो उसमें खुद की तस्वीर तलाशने की कोशिश करता है. यही तस्वीर उसे अपने कंप्यूटर पर भी दिखाई देती है क्योंकि वीडियो गेम का हीरो शानदार तरीके के पिस्टल चलाता है, बम फोड़ता है और जीत हासिल करता है. बच्चे को लगने लगता है कि हथियार में ही शक्ति है, वही उसे कम वक्त में उसकी मनचाही मुराद पूरी करा सकता है. इस तरह हथियारों के प्रति उसकी चाहत बढ़ने लगती है. पैसे के प्रति उसका मोह खतरनाक सुनामी की तरह जीवन को तबाह करने की दिशा में आगे बढ़ जाता है.
दूर करें एकाकीपन
तो सवाल यह है कि क्या किया जाए? वक्त की अंधी रफ्तार से बच्चों को कैसे बचाया जाए. उनकी जिंदगी में उनका बचपन और उकी खिलखिलाहट कैसे वापस लाई जाए? यह सवाल जितना कठिन है, उससे ज्यादा कठिन इसे हमने बना दिया है. इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें केवल तीन दशक पहले लौटना होगा जब बच्चों की दुनिया में इतनी आपाधापी नहीं थी. दरअसल बच्चों को आज की आपाधापी से बचाने की जरूरत है. यह हम कर सकते हैं. इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि बच्चों के जीवन में आए एकाकीपन को दूर करना.
थ्री इडियट का प्रिंसिपल मत बनिए!
अमूमन होता यह है कि माता-पिता खुद ही यह तय कर लेते हैं कि उनके बच्चे को बनना क्या है. फिल्म थ्री इडियट में इंजीनियरिंग कॉलेज का प्रिंसिपल यही तो करता है! नतीजा? भले ही बच्च जान नहीं दे लेकिन उसकी जिंदगी की जान जरूर निकल जाती है. हम में से ज्यादातर लोग अपने बच्चे को आयएएस, डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं. एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं करते कि बच्चे का रुझान क्या है? किस चीज के प्रति उसकी ज्यादा चाहत है. किशोरावस्था तक बच्चे की चाहत समझ में आने लगती है. उस पर दबाव मत डालिए, उसे जो बनना है, बनने दीजिए. उसे केवल इतना बताइए कि जो बनो, बेहतर बनो! आपका दबाव उसे तनावग्रस्त बना सकता है.
कानून का सम्मान करना सिखाइए
बच्चे को यह बताना बहुत जरूरी है कि सही राह उसके जीवन को कैसे खुशहाल बना सकती है. उसे कानून का पालन करना सिखाइए. कानून का सम्मान आपके आचरण में शामिल होगा तो आपका बच्च भी यही सीखेगा. आप ट्रेफिक के नियम तोड़ेंगे तो वह बड़ा होकर आपसे ज्यादा नियम तोड़ेगा. आप भ्रष्ट होंगे तो वह आपसे ज्यादा भ्रष्ट साबित होगा. इसलिए तय आपको ही करना है कि आपका बच्च कैसा बने.
कुछ खास बातों पर ध्यान दें.
- बच्चों से दोस्ताना लेकिन अनुशासनपरक व्यवहार करें
- हम बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताए.
- अपने बच्चे की मन:स्थिति को समझने की कोशिश करें.
- ध्यान रखें कि आपका बच्च क्या करता है, कहां जाता है.
- घर लौटने का समय निर्धारित करें.
- कभी-कभी स्कूल फोन करके बच्चे के व्यवहार के बारे में पूछें
- यह सुनिश्चित करें कि उसकी दोस्ती अच्छे बच्चों के साथ हो.
- बच्चे के दोस्त के परिवार से निकटता बढ़ाएं.
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